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गुरु तत्त्व-Master element and master's greatness

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गुरु तत्व और गुरु की महानता

गुरु का शाब्दिक अर्थ है बड़ा और गुरु वो है जो ज्ञान दे. यानिकि गुरु वो ही बन सकता है जिसमे ज्ञान हमसे अधिक हो. बालक के लिये पहले गुरु हैं माता पिता. गुरु एक ही होगा ऐसा नहीं हैं, अलग अलग ज्ञान के लिये अलग गुरु की आवश्यकता होती है. जैसे कि अगर माइक्रोसॉफ्ट की शिक्षा लेनी है तो गुरु अलग है और भौतिक विज्ञान तो दूसरा, इसी तरह अध्यात्मिक गुरु अलग है और पाकशास्त्र के लिये दूसरा. गुरु से सीखने के लिये झुकना पड़ता है, गुरु पर विश्वास करना पड़ता है गुरु जो मार्ग दिखता है उसपर चलकर देखना पड़ता है मतलब वो व्यवहार में लाना पड़ता है और अनुभव करके ही हम किसी दूसरे के लिये गुरु बन सकते हैं. गुरु शिष्य का रिश्ता कितना आत्मीय होता है कि शिष्य की उन्नति से गुरु को खुशी होती है, महाभारत में जब अर्जुन आचार्य द्रोण पर बाण चलाते हैं तब भी द्रोण को इस बात पर गर्व होता था कि अर्जुन उनका शिष्य है और इस तरह नफरत का भाव नहीं पनपता. यही हमारे समाज में विचारधारा है जिसका आगे बढाना बहुत जरूरी है ताकि नफरत कम हो. जिसने हमें ज्ञान दिया उसके प्रति श्रद्धा होनी चाहिये ना कि उनका मज़ाक बनाया जाये. आजकल कालेज में यह बात आम हो गयी है,हालांकि इस स्थिति के लिये कुछ शिक्षक भी जिम्मेदार हैं, लेकिन ढर्रा बदलने की जरूरत फिर भी है, अभिभावक भी इस बात का ध्यान दें कि अपने बच्चे को गुरु / शिक्षक के प्रति आदर करना सिखाएं. मुझे आज भी याद है वह घटना, मेरे पिता स्टेशन मास्टर थे मेरे प्राचार्य स्टेशन आये किसी काम से तो मैने पिताजी से परिचय कराया कि हमारे प्राचार्य हैं, पिताजी छूटते ही बोले, मुझे तो नहीं लगता यह तुम्हारे प्राचार्य हैं, प्राचार्य जी भी हक्का बक्का रह गये मैं भी चौंक गया मैने कहा सही में यही हमारे प्राचार्य हैं, तो पिताजी बोले मैं तब मानता जब तुम पहले इनके चरणस्पर्श करते फिर कहते कि प्राचार्य हैं तो मैं मानता. तुम्हारा परिचय का तरीका ही गलत था. तब मैने अनुभव किया कि ऐसे अभिभावक भी होने चाहिये और ऐसे बालक भी.
कितना सही कहा गया है गुरु की महिमा में " गुरु गोविन्द दौउ खड़े काके लागूँ पाँय , बलिहारी गुरु आपने जिन गोविन्द दियो बताय " गोविंद तक पहुंचने का रास्ता भी तो गुरु ने ही बताया, रामायण के अनुसार काक भुशुण्डी के गुरु ने तो शिव जी के श्राप से भी उन्हे बचाया. इस तरह गुरु की महिमा का वर्णन करना आसान नहीं, गुरु की महत्ता हर युग में रही और रहेगी
आध्यात्मिक गुरु जैसे श्री श्री रविशंकर, आसाराम बापू, सुधांशु महाराज से मिलने और सिर्फ छूने के लिये एक होड़ सी लग जाती है, हमें गुरु के शरीर से नहीं गुरु तत्व से संपर्क रखना चाहिये मैने स्वयं देखा है इतनी धक्का मुक्की करते है लोग, यहाँ तक कि गुरुजी को छू छू कर नोंच डालते है लोग, यह पागलपन नहीं तो और क्या है, व्यक्तिवाद की पूजा से हम इतना ग्रसित हैं कि गुरु तत्व को महत्व ना देकर उनके शरीर, उनके चमत्कार और उनकी शक्ल पर अभिभूत होते रहते है जो कि गलत है गुरु का स्मरण और उपस्थिति ही काफी होती है ज्ञान देने के लिये, शिष्य में ग्राह्य क्षमता, ज्ञान की ललक होनी चाहिये तभी कौशल आता है नहीं एक ही कक्षा में कोई सर्वोच्च अंक पाता है कोई फेल होता है, गुरु के सान्निध्य मात्र से ज्ञान की धारा बहने लगती है, बस जरूरत है ग्राह्य क्षमता की, आखिर गुरु आपकी क्षमताओं को ही तो परिवर्धित करते हैं, ज्ञान तो अपने अंतर में है, अन्यत्र कहीं नहीं. गुरु को समर्पित कर जो कविता मैने लिखी वो इस प्रकार है,

गुरु वही जो ज्ञान दे बदले समाज ये ध्यान दे 
अनुभव कराये ज्ञान का  जीवन को इक पहचान दे 
आत्म ज्ञान सबसे बड़ा पर तीन शर्तें हैं जुडी 
जिज्ञासा का भाव हो और दोष मिट जाए सभी 
फिर योग्य गुरु अवलंब हो ज्ञान धारा जो बहे 
अहंकार तज कर मनुज विष सा विषयों से दूर रहे 

चयन कर्ता शिष्य है गुरु को कहाँ विकल्प है     
बच्चे सच्चे कच्चे लुच्चे गुरु के सभी प्रकल्प हैं 
योग क्षेम सबका करें गुरु सा उदार कोई नहीं 
आशीष से है कृतज्ञ सभी छोड़े कसर कोई नहीं 

टूटकर जब बिखर जाएँ एक गुरु जी आसरा 
गुरुदेव ही मेरा मायका गुरुदेव ही है सासरा 
गोविन्द से बढ़कर गुरु वर्णित यही है पुराण में 
भुसुंडी को भी माफ़ किया शापित किया त्रिपुरारि ने 

शिष्यवत अर्जुन झुका तो ज्ञान सुधा गीता दिया 
नानक कबीर रामकृष्ण ने भारत को नव वैभव दिया 
"जीवन जीने की कला" के जब श्री श्री ने सूत्रपात किया 
मन से शरीर से आत्मबल से बढ़ने का अवसर दिया 

सेवा सत्संग और साधना से हर चेहरे को मुस्काना है 
गाँव शहर प्रदेश देश इस वसुधा पर दीप जलाना है 
सार यही जीवन का है पितु मातु गुरु को मान दें 
उत्सव मने हर पल तभी और स्वयं को सम्मान दे 

गुरु वही जो ज्ञान दे बदले समाज ये ध्यान दे 
अनुभव कराये ज्ञान का जीवन को इक पहचान दे
 जय गुरुदेव !!!  कृष्णं वंदे जगद्गुरो ...

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