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मनोरोग क्या होता है ?-What is psychiatric

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मनोरोग क्या होता है ?


मानसिक स्वास्थ्य व मनोरोग
अच्छा स्वास्थ्य शारीरिक रूप से स्वस्थ शरीर भर नहीं, उससे कुछ ज्यादा होता है ; एक स्वस्थ व्यक्ति का दिमाग भी स्वस्थ होना चाहिए | एक स्वस्थ दिमाग वाले व्यक्ति में स्पष्ट सोचने और जीवन में सामने आने वाली समस्याओं, का समाधान करने की क्षमता होनी चाहिए | मित्रों, कार्यस्थली पर सहकर्मियों और परिवार के साथ उसके संबंध अच्छे होने चाहिए | उसे आत्मिक रूप से शांत और सहज महसूस करना चाहिए और समुदाय के दूसरे  लोगों को खुशी देनी चाहिए | स्वास्थ्य के इन पहलुओं को मानसिक स्वास्थ्य माना जा सकता है |
हम भले ही शरीर और दिमाग के बारे में इस लहजे में बात करते हों जै


से वे दो अलग चीजों हो, लेकिन हकीकत में वे एक ही सिक्के के दो पहलुओं के समान हैं | दोनों में बहुत कुछ की  साझेदारी है, पर हमारे आसपास के संसार को वे अलग दिखते   हैं | अगर दोनों में से किसी एक पर कोई असर पड़ता है, तो इससे दूसरा भी लगभग निश्चित रूप से प्रभावित होगा | अगर हम शरीर और दिमाग को अलग कर सोचते हैं, तो इसका यह अर्थ नहीं है कि वे एक-दसूरे से स्वतंत्र हैं |
ठीक जैसे हमारा शरीर बीमार पड़ सकता है, उसी तरह दिमाग ही रोगी हो सकता है | इस स्थिति को मनोरोग कहा जाता है | “किसी व्यक्ति द्वारा अनुभव की जाने वाली कोई भी बीमारी जो उसी भावनाओं, विचारों और व्यवहार को इस तरह प्रभावित करती है कि वे उसकी सांस्कृति मान्यताओं तथा व्यक्तित्व से मेल न खाएं और उस व्यक्ति तथा उसके परिवार की जिंदगी पर नकारात्मक असर डालें” , तो वह बीमारी मनोरोग कहलाएगी |
दो महत्वपूर्ण बिंदु हैं जो इस मार्गदर्शिका की सामग्री का आधार निर्मित करते हैं :
• मानसिक रोगों के कारणों और उनके उपचार की हमारी समझ में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी हुई है | ज्यादातर उपचार सामान्य या सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्त्ता के द्वारा प्रभावी रूप से किए जा सकते हैं |
• मनोरोग के दायरे में बहुत तरह की स्वास्थ्य समस्याएं आती हैं | ज्यादातर लोग मनोरोग को हिंसा, उत्तेजना और असहज यौनवृत्ति जैसे गंभीर व्यवहार संबंधी विचलनों से जुडी बीमारी मानते हैं | ऐसे विचलन अक्सर गंभीर मानसिक अस्वस्थताओं का परिणाम होते हैं | लेकिन, मनोरोग से पीड़ित ज्यादातर लोग दूसरे  सामान्य लोगों जैसा ही व्यवहार करते हैं और वैसे ही दिखते हैं | इन आम मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं में अवसाद, चिंता, यौन समस्याएं तथा व्यसनों की लग शामिल हैं |
मनोरोग के बारे में आपको चिंतित क्यों होना चाहिए ?
कई कारण हैं जिनके चलते आपको मनोरोगों के प्रति चिंतित होने की जरुरत है |
• क्योंकि वे हम सभी को प्रभावित करते हैं | ऐसा अंदाजा है कि पांच व्यस्क व्यक्तियों में से एक अपने जीवन में किस समय मनोरोग के अनुभव से गुजरता है | इससे पता लगता है कि मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं कितनी आम बात हैं | कोई भी मानसिक स्वास्थ्य समस्या से पीड़ित हो सकता है |
• क्योंकि वे सार्वजानिक स्वास्थ्य पर एक बड़ा बोझ हैं | विश्व के लगभग हर कोने में किए गए मनोरोग व्यक्ति की घर ओर बाहर काम करने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है | अध्ययन इस बात को दर्शाते हैं कि सामान्य स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं में खुद को दिखाने आने वाले वयस्कों में से 40 प्रतिशत किसी न किसी मनोरोग से पीड़ित हैं | सामान्य या सामुदायिक स्वास्थ्य सेवाओं में आने वाले अनेकों लोग अस्पष्ट शारीरिक स्वास्थ्य समस्याओं के उपचार के लिए आते हैं | इन समस्याओं को ‘साइकोसोमेटिक’ यानि मनो – शारीरिक या इसी तरह का कोई नाम दिया जा सकता है | दरअसल, इनमें से अनेकों लोग मानसिक स्वास्थ्य संबंधी किसी समस्या से पीड़ित होते हैं |
• क्योंकि वे व्यक्ति को बहुत असमर्थ बना देते हैं | हालांकि आम मान्यता यह है कि मानसिक बीमारियां शारीरिक बीमारी के मुकाबले कम गंभीर होती हैं, पर हकीकत में वे गंभीर असमर्थता पैदा करती हैं | आत्महत्या या दुर्घटना के कारण उनसे मृत्यु भी हो सकती है | कुछ लोग किसी मानसिक रोग के साथ-साथ शारीरिक रूप से भी पीड़ित होते हैं | ऐसे लोंगों में मानसिक रोग शारीरक रोग को और बढ़ा सकता है | 2001 में विश्व स्वास्थ्य संगठन की विश्व स्वास्थ्य रपट से यह बात सामने आई कि संसार भर में दस में से चार लोगों को जो रोग सबसे ज्यादा असमर्थ बनाते हैं, वे हैं मनोरोग | अवसाद सबसे ज्यादा असमर्थ बनाने वाली बीमारी पाई गई | एनीमिया, मलेरिया व अन्य सभी स्वास्थ्य समस्याओं से भी ज्यादा |
• क्योंकि मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं बहुत अपर्याप्त हैं | ज्यादातर देशों में मनोचिकित्सकों, मनोवैज्ञानिकों व अन्य मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों का घोर अकाल है | वे विशेषज्ञ अपना ज्यादातर  वक्त उन लोगों की देखभाल में लगाते हैं जो गंभीर मानसिक अस्वस्थताओं (साइकोसिस) से पीड़ित हैं | हालांकि ऐसे मनोरोग बहुत कम होते हैं, पर यही वे रोग हैं जिन्हें समुदाय मानसिक बीमारी के रूप में देखता है | अवसाद या शराब पीने जैसी अपेक्षाकृत बहुत आम मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित ज्यादातर लोग किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेने के लिए नहीं आते | इसलिए, सामान्य स्वास्थ्य कार्यकर्त्ता ही इन रोगों का उपचार करने की सबसे बेहतर स्थिति में है |
• क्योंकि हमारे समाज तेजी से बदल रहे हैं | संसार में अनेकों समाजों में नाटकीय आर्थिक व सामाजिक बदलाव आ रहे हैं | तीव्र विकास, पलायन, बढ़ती हुई आर्थिक असमानता, बेरोजगारी और हिंसा के स्तरों से होती बढोत्तरी के चलते समुदायों का सामाजिक ताना-बाना बदल रहा है | ये सभी कारण खराब मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े हुए हैं |
• क्योंकि मनोरोग के कारण सामाजिक लांछन लगता है | मानसिक स्वास्थ्य से सम्बंधित समस्या से पीड़ित ज्यादातर लोग मानाने को तैयार ही नहीं होते कि उन्हें कोई रोग है | जिन लोगों को मानसिक रोग होता है, उनके साथ अक्सर समुदाय और उनके परिवार के द्वारा भेदभाव किया जाता है | स्वास्थ्य कार्यकर्ता आम तौर पर उनसे सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार नहीं करते |
• क्योंकि मनोरोग का सरल और अपेक्षाकृत सस्ते तरीकों से उपचार किया जा सकता है | यह सही है कि मनोरोग ‘ठीक’ नहीं हो सकते | लेकिन कैंसर, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और जोड़ों के गठिया जैसे अनेकों शारीरिक रोग भी ‘ठीक’ नहीं हो सकते | पर इसके बावजूद, इन शारीरिक रोगों से पीड़ित व्यक्तियों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार कनरे के लिए काफी कुछ किया जा सकता है | यही बात मनोरोग पर भी लागू होती है |
मनोरोग की किस्में
किसी मनोरोग को पहचानने और उसका निदान करने के लिए आपको लगभग पूरी तरह उन बातों पर ही निर्भर करना पड़ता है जो कि लोग आपको बताते हैं | इसके निदान का प्रमुख उपकरण उस व्यक्ति के साथ साक्षात्कार करना है | मनोरोगों से ऐसे लक्षण पैदा होते हैं जिन्हें उनसे पीड़ित व्यक्ति और उनके आसपास के लोग महसूस कर सकते हैं | ये लक्षण मुख्य रूप से पांच प्रकार के होते हैं :
• शारीरिक – ‘सोमेटिक लक्षण’ | ये शरीर के अंगों और शारीरिक क्रियाकलापों पर असर डालते हैं | इनमें विभिन्न तरह के दर्द, थकान तथा नींद संबंधी समस्याएं शामिल हैं | इस बात को याद रखना जरुरी है कि मनोरोग अक्सर शारीरिक लक्षण पैदा करते हैं |
• महसूस करना – भावनात्मक लक्षण | उदास या डरा हुआ महसूस करना इसके प्रतिनिधि उदहारण हैं |
• सोचना – ‘ बौद्धिक’ लक्षण | आत्महत्या के बारे में सोचना, यह सोचना कि कोई आपको नुकसान पहुंचाने जा रहा है, साफ़-साफ सोचने में मुश्किल आना तथा भुल्लकड़पन इसके प्रतिनिधि उदहारण हैं |
• व्यवहार – व्यवहार संबंधी लक्षण | ये लक्षण व्यक्ति द्वारा किए जाने वाले क्रियाकलापों से सम्बंधित हैं | इसके उदहारण हैं : आक्रमक तरीके से व्यवहार करना और आत्महत्या की कोशिश करना |
•  निराधार कल्पनाएँ करना – इन्द्रियबोध संबंधी लक्षण | ये किसी इंद्रिय द्वारा पैदा किये जाते हैं और इनमें ऐसी आवाजें सुनना, चीजें देखना शामिल हैं जिन्हें और लोग सुन-देख नहीं सकते |
हकीकत में यह सभी अलग-अलग तरह के लक्षण एक दूसरे  से बहुत   निकट से जुड़े हैं | उदहारण के लिए, देखिए कि किसी एक ही व्यक्ति में ये अलग-अलग लक्षण हो सकते हैं |
मोटे तौर पर मनोरोग की छः श्रेणियां है :
• आम मानसिक अस्वस्थताएं (अवसाद और चिंता से ग्रस्त रहना) ;
• ‘बुरी आदतें’ जैसे शराब और नशीली दवाओं के बिना न रह सकना ;
• गंभीर मानसिक अस्वस्थताएं (मनोविकृतियाँ या साइकोसिस) ;
• मंदबुद्धि होना ;
• बुजुर्गों की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं ;
• बच्चों की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं |
आम मानसिक अस्वस्थताएं (अवसाद और चिंता से ग्रस्त रहना )
केस 1
पहला बच्चा होने के वक्त लूसी 23 साल की थी | बच्चे के जन्म के बाद शुरू के कुछ दिनों के दौरान यह थकान और उलझन महसूस कर रही थी | दाई ने उसे यकीन दिलाया कि वह भावनात्मक परेशानी से एक छोटे से दौर भर से गुजर रही है और ऐसा अनेकों माताओं को महसूस होता है | उसने सलाह दी कि लूसी और उसका पति काफी समय साथ गुजारें और मिल कर बच्चों की देखभाल करें | इससे उसकी मानसिक स्थिति में सुधार आएगा | उम्मीद के मुताबिक ही लूसी हो कुछ ही दिनों के भीतर अच्छा महसूस होने लगा | एक महीने तक सब टिक लगता रहा, उसके बाद बहुत धीरे-धीरे वह फिर थका और कमजोर महसूस करने लगी | उसकी नींद उचटने लगी | वह हालांकि थका महसूस करती, पर काफी सुबह जग जाती | उसके दिमाग में खुद अपने और अपने बच्चे तक के बारे में गलत ख्याल आते | दूसरी बात उसे और ज्यादा डराती | घर की जिम्मेदारीयों में उसकी दिलचस्पी खत्म होनी शुरू हो गई | लूसी के पति को उसका व्यवहार आलसी और लापरवाह लगता है और इससे वह चिढ़ने लगा | जब सामुदायिक नर्स बच्चे की रूटीन जाँच के लिए आई, तब कहीं जाकर लूसी के अवसाद का निदान हुआ |
समस्या क्या है ? लूसी एक किस्म के ऐसे अवसाद से पीड़ित थी जो बच्चे के जन्म के बात मातों को हो जाता है | इससे प्रसव – पाश्चात (पोस्टनेटेल) का अवसाद कहते हैं |
केस 2
रीता 58 साल की महिला थी जिसका पति पिछले साल अचानक मर गया था | उसके सब बच्चे बड़े हो गए थे और रोजगार के बेहतर अवसरों की तलाश में एक बड़े शहर चले गए थे | अपने पति की मौत के फौरन बाद उसे कम नींद आने लगी है और उसकी भूख खत्म हो गई | पिता की अंत्योष्टि के बाद उसके बच्चे गाँव से चले गए और उसके ये लक्षण और बिगड़ गए | उसके सर, पीठ और पेट दर्द के अलावा दूसरी जिस्मानी परेशानियाँ भी होने लगी | इनके कारण वह एक स्थानीय क्लीनिक में सलाह लेने पहुंची | वहां उसे बताया गया कि वह ठीकठाक है और नींद की गोलियां और विटामिन लिख दिए गए | इसके फ़ौरन बाद उसे बेहतर महसूस हुआ | खासकर उसकी नींद में सुधार हो गया | लेकिन, दो  सप्ताह के भीतर ही उसे फिर कम नींद आनी शुरू हो गई और वह दुबारा से क्लीनिक पहुंची | उसे और ज्यादा नींद की गोलियां और इंजेक्शन दिए गए | महीनों तक यही कुछ चलता रहा और आखिर में हालत यहाँ तक पहुंच गई कि उसे गोलियों के बगैर नींद आनी बंद हो गई |
समस्या क्या है ? पति की मौत और बच्चों के अब उससे दूर चले जाने से पैदा हुए अवसाद के लक्षण उसमें शारीरिक रूप से सामने आ रहे थे | क्लीनिक के डॉक्टर ने उससे उसकी भावनाओं के बारे में नहीं पूछा और उसे नींद की गोलियां दे दीं | इसके कारण उसे नींद की गोलियों की आदत हो गई |
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