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अभ्यास और त्याग-Practice and sacrifice

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अभ्यास और त्याग

पिछले क्रमांक में हमने इन्द्रियों, मन और चित्त के स्वरूपों के बारे में सीखा. 

हमने  जाना कि  कैसे इन्द्रियों की पहुच मन तक नहीं जा सकती और मन की पहुच चित्त तक नहीं जा सकती. 

हमने यह भी सीखा की इन्द्रियों, मन और चित्त के कौशल किस प्रकार के हैं. 

इन्द्रियों का कौशल संयम और निग्रह में है.

मन का कौशल एक  तत्व  वाले संतोष और अपेक्षा रहित प्रेम भाव में है. जो की विषयों से निर्लिप्त है.

चित्त का कौशल सरलता, चिंता रहित और द्वंद्व रहित होने में है.   

इसका कारण यह है कि यह गुण मनुष्य को शान्ति के और ले चलते हैं. और शान्ति का मार्ग प्रगति का मार्ग है. शान्ति का मार्ग उन्नति का मार्ग है. शान्त स्वभाव वाला मनुष्य के पास सभी हुनर समा जाते हैं. 

इस क्रमांक में हम सीखेंगे कि कैसे इस शान्ति और कौशल को बनाए रखा जाए और कैसे कैसी भी परिस्थिति में दृढ होकर उस पर सहज विजय प्राप्त की जाए. और साथ ही अपने निज स्वभाव को हमेशा संजोए रखा जाए. 

इसकी विधि दो पहलू वाली है. पहला पहलू अभ्यास का है. जिस तरह बूँद बूँद करके घड़े में पानी भरा जाता है, ठीक उसी प्रकार से अभ्यास भी करना चाहिए. हड़बड़ी में किये गए अभ्यास से खामियां और अस्थिरता आती है. बिलकुल ही अभ्यास न करने से मनुष्य सुस्त हो जाता है. बूँद बूँद से करने वाले अभ्यास से ही अपने अन्दर के गुण प्रबल होते हैं और हमेशा हमारे साथ रहते हैं. इससे गलतियों कि गुंजाइश भी दूर हो जाती है. 

मनुष्य को चाहिए कि वह सबसे पहला अभ्यास तो यह करे कि मन, चित्त और इन्द्रियों को ऐसे परिस्थितियों और विषयों से हटाए जहां इन्द्रियाँ, चित्त और मन भ्रमित होते हो. भ्रम से ही मन और चित्त में उद्वेग उत्पन्न होता है. यही आगे चल के दुःख का रूप ले लेता है. यदि किसी परिस्थिति या विषय, जिसमे भ्रम के विकल्प अत्यधिक हों, तो ऐसी स्थिति में प्रयास यह करना चाहिए कि हम अपने विवेक में यह बात स्पस्ट रूप से बैठा लें कि कौन से कार्य चित्त के कर्मक्षेत्र में आते हैं, कौन से मन के और कौन से इन्द्रियों के कर्मक्षेत्र में आते है. यह भली भाँती जान कर हम कर्मों में रक्त रहें. 

हम स्पस्टता का साथ न छोड़ें. क्योंकि स्पस्ट रहने से ही विवेक जागता है. हमने तो चित्त, मन और इन्द्रियों के कौशल के बारे में पहले ही जान लिया है. इसलिए अब किसी भी परिस्थिति में संशय संदेह को हटा  कर हम आत्म विश्वास से युक्त होकर योगाचरण का मार्ग अपनाएं. 

त्याग 

मनुष्य की प्रगति का एक एहम पहलू है कि वह क्या अपनाता है और किस चीज़ का त्याग करता है. हमने पहले ही ये जाना है कि सभी मनुष्य एक ही तत्व के बने हैं बिना किसी भेद भाव के. सृष्टि ने कभी भेद भाव नहीं किया. फिर यह क्या है जिससे एक मनुष्य सफलताओं की सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ता रहता है और दूसरा  वंछित रह जाता है. दरअसल इसका कारण है मनुष्य के अपने निर्णय. हम जो त्यागेंगे और जो अपनाएंगे, हमारी प्रगति उसी पर निर्भर करेगी. 

सद्गुणों का कभी भी त्याग नहीं करना चाहिए. वह मनुष्य के अनेक गहनों में से एक हैं. 

अब प्रश्न उठता है कि त्याग किसका किया जाए. इसका निर्णय आप स्वयं अपने आप लें. आप निरीक्षण करें कि कौन सी वस्तुएं आपकी इन्द्रियों को सुस्त, संयम रहित और बेकाबू बनती हैं. ऐसी कौन से वस्तुए हैं जो कि अवरोधक है. बिना किसी अन्य के बहकावे में आए आप ये निर्णय स्वयं लें. 

आप फिर निगरानी करें कि कौन सी वस्तुएं या आचरण मन को बेकाबू या दूषित या आलसी या कमज़ोर करते हैं. फिर सहजता से उनका त्याग कर दें. 

आप निरीक्षण करें कि कौन से विचार आपके चित्त के लिए  लाभकारी  हैं. कौन से विचार सकारात्मक हैं. चित्त में अपने लक्ष्य के प्रति किसी भी नकारात्मक विचारों को जगह न दें. नकारात्मक विचार संशय उत्पन्न करते हैं. नकारात्मंक विचारों के त्याग का यह अर्थ नहीं है कि आप आखें मूँद कर बस यही मान बैठें कि सब अच्छा ही अच्छा होगा. अपितु आप कर्म के सभी पहलुओं पर विमर्श अवश्य करें.

इसी अभ्यास और त्याग के ओजारों से जब मनुष्य स्वयं के प्रकृतियों पर महारत हासिल कर लेता है, तब उसमे साक्षी भाव जागता है. तब वह कर्मों में लगा हुआ भी किसी भी तनाव या दुःख को प्राप्त नहीं होता. जब हम पूरे मन से गाडी चला रहे होते हैं, खाना पका रहे होते हैं, खेल रहे होते हैं या फिर कोई भी मनपसंद काम कर रहे होते हैं, उस वक़्त हम कितने मधुर भाव से साक्षी होकर कर्म करते हैं. वही स्थिति ही कर्म कौशल है.

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