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मौन 21

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न साधना करने से मिलते हैं ये फायदे
August 6, 20161 Min Read
keep_silence
बरसते पानी में यदि छाते की छड़ किसी और ने थाम रखी हो तो आपका भीगना तय है। छाते को सबसे अच्छा वही पकड़ और संभाल सकता है, जो भीगने से बचने के लिए उसका उपयोग करना चाहता हो। ऐसे ही जिंदगी में कई बार हम अपने बचाव या सुरक्षा के प्रमुख साधनों की कमान दूसरों को सौंप देते हैं और परेशान होते हैं। दूसरों को हमें क्या और कितना देना है इसकी समझ कायम रखें। इसी समझ की कमी के कारण हम कुछ महत्वपूर्ण चीजें भी दूसरों को पकड़ा देते हैं जैसे प्रभावी शब्द। हम अपने कई महत्वपूर्ण शब्द दूसरों पर खर्च कर देते हैं। दिनभर में हम अपने-पराए कई लोगों से मिलते हैं और इतना बोलते हैं, अपने शब्दों को बेकार फेंक रहे होते हैं। ये शब्द केवल बाहर निकलकर बातचीत ही नहीं कर रहे, हमारी ऊर्जा को भी चूसकर बाहर कर रहे हैं। यह ऊर्जा कहीं और काम आ सकती है।
थोड़ा विचार करें कि शब्द बाहर फिंक क्यों जाते हैं? बोलने के बाद लगता है कि नहीं बोला होता तो ठीक था। दरअसल, जब भीतर विचारों का शोर होता है तो ये बेतरतीब, भड़-भड़ करते विचार आपके शब्दों को बाहर धक्का दे देते हैं और इस तरह निकले शब्द अर्थहीन बकवास बन जाते हैं, संभव है अनर्थ भी पैदा कर दें। भीतर के विचार, उनका शोर रोकना हो तो मौन साधना पड़ेगा। जैसे ही मौन की बात आती है, लोग होंठ बंद कर लेते हैं, लेकिन यह मौन नहीं, यह तो चुप्पी है। चुप्पी से कुछ हासिल नहीं होगा। हासिल होगा मौन से और मौन तब घटता है जब आप स्वयं से भी बात करना बंद कर देते हैं। जैसे ही आपने मौन साधा, विचार विदा हो जाएंगे और इसके बाद जो शब्द होंगे वे अद्‌भुत प्रभावशाली होकर आपकी ऊर्जा को बढ़ाने वाले होंगे।

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