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सिद्ध पुरुष के लक्षण - Signs of a perfect man Mr. Raman Maharishi

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सिद्ध पुरुष के लक्षण  श्री रमण महर्षि

पूर्ण सिद्धि ही विशुद्ध उपासना है और उपासना ही सिद्धि है। गुरु वही है जिसने मात्र ईश्वर पर ध्यान लगाया हो एवं अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व को ईश्वरमयी सागर में फेंककर, इसमें डूबकर स्वयं को भूल गया हो जब तक कि वह ईश्वर का निमित्त न बन जाए। और जब उसका मुखारविंद खुले तो बिना किसी पूर्वविचार के प्रयास से ईश्वर की वाणी फूटे। और जब वह हाथ खड़ा करे तो स्वयं ईश्वर के हाथों वह चमत्कार पूरा हो। रहस्यमयी सिद्धियों और ऐसी चीज़ों के बारे में अधिक मत सोचो। इनकी संख्या अत्यधिक है – सर्वथा अनिश्चित और जब एक बार जिज्ञासु के हृदय में ये घर बना लेती हैं तब तक ये सिद्धियाँ अपना कमाल दिखा चुकी होती हैं। दिव्य-दृष्टि, परोक्ष-श्रवण और ऐसी ही अन्य चीज़ों की कोई महत्ता नहीं है जबकि इनके बिना ही प्रकाश एवं शान्ति को पाया जा सकता है, न कि इनके साथ। गुरु इन सिद्धियों को आत्म-हानि के रूप में देखता है। मैं उन दो श्रेष्ठ गुरुओं के बारे में जानता हूँ और यह बता दूँ कि ऐसी राय कि उन्होंने ये पराशक्तियाँ सतत प्रयास और स्तुति या किसी अन्य चीज़ों से अर्जित की हैं पूर्ण रूप से सर्वथा मिथ्या है। कोई भी गुरु रहस्यमयी पराशक्तियों की परवाह नहीं करता क्योंकि उसे रोज़मर्रा के जीवन में इनकी कोई आवश्यकता नहीं रहती।

हम ऊपर लिखी श्री रमण महर्षि की शिक्षा को चेतावनी स्वरूप आमजन को बता रहे हैं ताकि वे उन लोगों के बहकावे में न आयें जो शास्त्रों के बारे में वाक्पटुता से बोलते हैं जैसे शास्त्र ही साक्षात् ईश्वर हों। इससे भी बुरा तो यह है कि जनसाधारण ऐसे लोगों के शिकार हो जाते हैं जो उन्माद भरी विद्वता प्रदर्शित करते हैं और इसे ही एक महान् गुरु का लक्षण मान बैठते हैं। किसी की आध्यात्मिक श्रेष्ठता को मापना हो तो उससे मात्र यही प्रश्न करना चाहिए कि आप कितना समय ईश-आराधना में व्यतीत करते हैं? क्या आप स्वयं का सामंजस्य बाकी सृष्टि के साथ रखते हैं अथवा नहीं? अंततोगत्वा परमेश्वर की कृपा सच्चे साधक को एक गुरु को पहचानने तथा सन्मार्ग पर ले जाने में अहम भूमिका निभाएगी।

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