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नरसी जी की हुंडी - Narshi bhagat ki hundi in dohe in hindi

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जिय में निशि वासर जरत,पुनि नित करत प्रपंच।
नरसी सो बान्धव निलज, राखत प्रेम न रंच।।
बान्धव जन से वैर की,बरनत हों एक बात।
आई गढ़ में एक दिन,जुरि के सन्त जमात।।
लोगन सों पूछ्यो इहाँ, का कहूँ साहु नाहीं।
जाकी हुंडी चलि सकत,पूरी द्वारका माहीं।।
जरे भुने जे बन्धु जन,लै नरसी को नाम।
दीन्हो तिन्हे बताई द्रुत,ताकौ पतै तमाम।।
ब्याजस्तुति किन्ही बहुत,बहु विधि बात बनाई।
अधोलिखित पाटी अधम,परिजन दइ पढ़ाई।।
नरसी जौ माने नहीं, करे साफ़ इंकार।
तौ पग ता के पकर के,बिनवहुँ बारम्बार।।
सन्त असन्त न देखहीं,देत दुलत्ती झार।
खलजन एते खलक में,चुकत नाहीं चमार।।
खल को रखिये ख्याल नित,खुदा दुसरो मान।
बन्दिये ता को बिनयजुत,जोरी जानी जग पानि।।
सीधे सादे सन्त सब,जानि सके नहीं जाल।
जहँ नरसी की झोपड़ी,आए तहाँ उताल।।
"जै नरसी की" सन्तजन सब बोले इक साथ।
नरसी तिन्हे निहार के,उठ्यो जोरि दोउ हाथ।।
बोल्यो नरसी बिनय तें, अहो भाग मम आज।
कुटिया को पावन करी, सहृदय सन्त समाज।।
स्वार्थ बस आए सकल,सन्त कह्यो ए साह।
बढ़ै भाग तेरो बहुत,लाखन कौ ह्वै लाह।।
यों कहें खींसे खोली अब,खली कीन्ह नितंत।
नरसी ढिग ढेरी करत,गिन गिन रुपया सन्त।।
कहा बात? नरसी कह्यो,कृपया देहुँ बताई।
करे जातु को ढेर क्यों,गिन गिन मों ढिंग लाइ।।
कै गुलाम घनश्याम को,कै हड़ी भक्त गुलाम।
हों गुलाम नहीं दाम को,देहु मोहिं क्यों दाम।।
दाम न मोकौं चाहिये, हौं हरी दामन गीर।
गिनो ब्याल सम दाम को,जम की दृढ जंजीर।।
राम विमुख रखि रात दिन,हिय उपजात हराम।
भगत न चाहत दाम सो,भगतन चाहत दाम।।
सन्त कह्यो हम नाम सुनि, आए तेरे पास।
हुंडी लिखवानी हमें, यहै काम है ख़ास।।
हमैं जावनो द्वारिका,हम सब साधु संत।
कोउ मग में लूट के,करिहैं सब को अंत।।
यांते रुपया सात सौ, हम लोगन सों लेहुँ।
अरे सेठ !अहसान करि, हम को हुंडी देहुँ।।
सुनि सम्बोधन "सेठ" निज नरसी जोड़े हाथ।
बोल्यो, हौं तो दास हौं, सेठ द्वारकानाथ।।
हंसी करत क्यों सन्त ह्वै,मोकों सेठ पुकार।
कौन कह्यो या दीन कैं,हुंडी को ब्यौपार।।
घास फूस की झोपरी, तैसो सर अंजाम।
देबे को तुम्बी इहाँ, लेबे कौ हड़ी नाम।।
अरे सन्तजन!आपकौं कौन दये भरमाई।
कीन्ह मसखरी कौन यह,डीजे मौहिं बताई।।
अरे भक्त!हम साधुजन,कौन हमें भरमाई।
तूँ भरमावत क्यों वृथा,बीसों बात बनाई।।
कहा बतावत यों कुटी,तुम्बा हमें तमाम।
ये तो प्यारे! प्रिय हमें, इन्हीं सो है काम।।
सांचे ज्ञानी होत सो, सरल रहत जिमि साध।
वैभव तें बौरात ना, उर के होत अगाध।।
तूँ ज्ञानी ध्यानी परम्,दानी सेठ लखात।
तो सानी कोउ और ना,जानी हम यह बात।।
तू तौ रुपया लेइ कै, लिखी दै हुंडी साह।
पटिहै कै पटिहै नहीं,याकि ना परवाह।।
जान्यो नरसी बंधुजन,चाली कै तौ चाल।
कै भगवत किन्ही कृपा,भेज्यो खर्च दयाल।।
यों बिचार नरसी बिबस, सुमर इष्ट घनश्याम।
हुंडी लिखी निज हाथ सों, सौपी दै सरनाम।।
कह्यो नाम है सेठ को,साँवलासाह प्रसिद्ध।
करों सन्त प्रस्थान अब,ह्वैं हैं कारज सिद्ध।।
हुंडी हाथों हाथ लै,सिद्धि कृ सब सन्त।
पूरी द्वारका पहुंच कै, उतरे जाइ एकन्त।।
कियौ तहाँ विसराम कुछ,खानों पिनो खाई।
ढूंढन लागे शाह को,अब बाजार में आई।।
लाग्यो पतो न लेशहुँ, होइ सन्त हैरान।
सब ही आए साँझ को,ताकि अपने थान।।
बैठे सोच विचार में,अब सब होइ उदास।
साह रूप धरि साँवरो,प्रगटि पधार्यो पास।।
( कवित्त)
माथे पे लपेट राखी,अटपटा पाग मोटी।
खुल खुल जाती चोटी फरहत न्यारी है।।
खिसक-२ परीं एडिन लौं धोती।
,जाति घिसी आती अंगरखी घेरघार वारी है।।
कटी के लपेटि राखो,लांबो सो दुपट्टो ,और
पेट राख्यो काढकछु चाह के अगारी है।।
कान प कलम, बही बगल दबायें साह।
काँधे धरि धम्म से,सुथैली आन डारि है।।
(दोहा)
सन्तन सों अब सेठ जी,पूछ्यो बोल प्रणाम।
हुन्डी को लाए यहां ? नरसी की मो नाम।।
यह सुनि, सन्तन के तुरत आए तँ में प्राण।
बोलि उठे चट उचकि, हम लाए हैं श्रीमान।।
हारे हम तो हेरिकै,सकल द्वारका माँहि।
पै हमकों तौ आप को,पतो लग्यो कहूँ नाहीं।।
आप छुपे रुस्तम अहो,नरसी सेठ समान।
जगत सेठ से जचत हो,का हम करें बखान।।
साधुन की सुध लइकै, कियो अमित उपकार।
घर घर होवे आपकी,जग में जय जयकार।।
दै असीस हुंडी दइ, साधुजन सम्भलाई।
साह बाँच तिहिं सातसौ रुपया दये गनाई।।
थैली को मुख बाँध कै, करि लेखे को काम।
पत्र लिख्यो अब प्रेम सौं, नरसीजी के नाम।।
(कविता)
सिद्ध श्री जूनागढ़ साह सिरताज श्री
भक्तराज नरसी सों जै जै नरसी की है।।
कुशल इहाँ पै सब आपहुं कुशल,हम-
सन्तन सों जानी सब बात तहँ निकी हैं।।
हुन्डी के रुपया रोक सातसौ चुकाई दीन्हे,
खोटी नाहीं किन्हें,ना लगाई बात फीकी है।।
जानिके गुमास्ता जरूर याद किज्यो हमें,
काम काज लिखियो दूकान आप ही की है।।
(दोहा)
यों चिट्ठी लिखी चाव सों, सौंपी साह सुजान।
माफ़ी सब सोँ मांगकै ,दीन्ही बिदा निदान।।
सन्त लोग कर जात्रा,पहुंचे नरसी पास।
सौंपी चिट्ठी साह की,हिय दरसाई हुलास।।
पढ़ि कागद अति प्रेम सों, नरसी गदगद होइ।
समाचार पूछे सकल,झट सन्तन दिसी जोई।।
अटपटा पगड़ी,पेट कटि ढीली सटपट चाल।
सन्त बखान्यो साह को,हंस हंस सगरो हाल।।
सुनि सुनि कै नरसी भगत,भयो मग्न मन माहीं।
जस न जतायो आँख पे,होठ हिलायो नाहीं।।
सन्तन के रुपया सकल,सन्तन काज लगाई।
भयो उऋण नरसी भगत,कृपा किन्ही जदूराई।।

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