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शांति

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       अगर तुम्हे अशांति से बचना है,अगर तुमने अपने मन में से बेचैनी को दूर निकालना है,चंचलता-त्रास को दूर करना है,सन्ताप को दूर करना चाहते हो तो याद रखना। यह न किसी धन से मिटेगी,न किसी प्रमोशन से, न विवाह से ,न स्त्री से,न पुरुष से-यह बाहर से नहीं मिटेगी।अंदर की त्रास अंदर से मिटेगी,और जब तुम अपने भीतर टिक जाते हो तो परम् शांत।
      जो मन की शांति व् संतोष पा लेता है,वही असल में जीवन जीता है।वही संग्राम विजयी है। फिर उस के पास मोटर,कार घर दर सम्पदाहो या न हो। यदि मन की शांति न रहि तो सारे सुख वैभव के बावजूद वह मनुष्य शापित की तरह संतृष्ट व् सुखहीन है।
       तुम्हारा अंतिम धेय शांति है।उस को प्राप्त करने का उपाय त्याग और सेवा है।
       शांति का अर्थ सो जाना नहीं, कर्तव्य कर्म छोड़ देना नहीं,बल्कि विचारों से रहित हो कर पूर्ण चेतना में आना है।
        शांति का सीधा सम्बन्ध हमारे ह्रदय से है।सहृदय
हो कर शान्ति की खोज कीजिए।
         शांति के अतिरिक्त और कोई आनंद नहीं है।
        अशुभ का विरोफह मत करो।सदा शांत रहो।आपकी इच्छा की धारा के विपरीत भ हो तो आप देखेंगे 
की प्रत्यक्ष बुराई भलाई में बदल जायेगी।
         बाह्य सन्दर्भों के बारे में सोच क्रप्नी मानसिक शांति को कभी भंग न होने दें।
         शांति ही भगवान की अनुभूति है।
          जितेंद्रीय,साधन परायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त हो कर वह बिना विलम्ब के तत्काल ही भगवद प्राप्ति रूप परम् शांति को प्राप्त होता है।
         जितनी आप की निष्ठां और सत्यता होगी,उतनी शांति अवश्य मिलेगी।

       
         

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