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मौन उद्गार के - Silence

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उद्गार मौन के

इस शोषक समाज से मुक्ति कैसे पाएँ?

new-microsoft-office-powerpoint-presentation-2प्रश्न: सर, मैं पूँछना चाहता हूँ कि जब समाज अपनेआप में एक अभिशाप है तो हमें समाज की ज़रूरत क्यों पड़ती है?

वक्ता: कुछ भी अभिशाप नहीं होता।

The Art and Technique of Silence, By Roberto Assagioli
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एक मात्र अभिशाप है ,‘न जानना’।

एक मात्र अभिशाप है ‘अज्ञान’ और ‘अज्ञान’ का वास कहाँ होता है? समाज में या व्यक्ति में? कहाँ होता है ‘अज्ञान’? अज्ञानी कौन होता है? समाज की कोई सामूहिक अज्ञानता तो होती नहीं है? अज्ञानता जो होती है, वो तो व्यक्ति के भीतर होती है न?

अज्ञानी व्यक्तियों का एक समूह एक अज्ञानी समाज ही बनाएगा। सही? आप समझ पा रहे हैं?  एक अज्ञानी व्यक्ति को अगर तथाकथित सबसे अच्छी परिस्थितियाँ या सबसे प्रबुद्ध समाज भी दे दिया जाए, तो भी उसे लगेगा कि वो अशांत है उसका शोषण किया जा रहा है। फिर वो यही कहेगा कि’सब अभिशाप है’, ’सब अभिशाप है’।

समाज आपको कोई हानि नहीं पहुँचा सकता अगर आप जागरूक हैं और अगर आप जागरूक नहीं हैं तो वो लोग जो आपके आस-पास हैं, भले ही उनके इरादे अच्छे हों आपकी बहुत ज़्यादा मदद नहीं कर पाएँगे। आपको अंत में हानि ही पहुँचेगी। आपको क्यूँ लगता है कि समाज एक अभिशाप है? आप में से कितने लोगों को समाज के बारे में कुछ समस्यात्मक लगता है? आप में से कितनों को कभी-कभी समाज के खिलाफ़ बगावत करने का मन करता है?

(कुछ श्रोता हाथ उठाते हैं)

हाँ, और ऐसा नहीं है कि इस बात में कुछ ख़ास है। हर व्यक्ति को अपने जीवन में किसी न किसी समय पर सभी नियम तोड़ कर अपने-आप को आज़ाद करने का मन करता ही है। ‘मुझे कोई सामाजिक बंधन, रूढ़ियाँ, धारणाएँ, मान्यताएँ नहीं माननी। मैं मुक्त हूँ, ये समाज मेरा शोषण करता है और ये बात मुझे पसंद नहीं है।’ लगता है न कभी-कभी ऐसा? आपको भी लगता होगा और आपने अपने चारों ओर भी देखा होगा; औरों को भी ऐसा लगता है। इसमें एक बात समझने जैसी है कि कोई आपका शोषण आपकी इच्छा के बिना कर नहीं सकता। पढना जारी रखे →

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सितम्बर 22, 2016Leave a reply
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क्षमा माने क्या?
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धीरज धरो छिमा गहो, रहो सत्यव्रत धार
गहो टेक इक नाम की, देख जगत जंजार
संत कबीर

वक्ता: पूछ रही हैं कि क्षमा क्या है? क्षमा है, क्षमा की ज़रुरत का अभाव।

क्षमा करने की ज़रुरत तब पड़ती है, जब चोट लगी हो‍‌‍‌। क्षमा उठती ही चोट से है। वास्तविक क्षमा कोई घटना नहीं है कि आपको चोट लगी और आपने माफ़ किया। वास्तविक क्षमा चित्त की वो निरंतर अवस्था है, जिसमें चोट खाना ही बड़ा मुश्किल हो जाता है। क्षमा को यदि आप एक घटना के तौर पे देखेंगे, तो भूल हो जाएगी। फिर आप कहेंगे कि मैंने क्षमा किया। पढना जारी रखे →

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सितम्बर 20, 2016Leave a reply
उक्तियाँ, अगस्त ‘१५
उक्तियाँ, अगस्त ‘१५

१. श्रद्धा – सच धुंधला दिख रहा है, पर जाएँगे उसी की ओर|

२. ज्ञान बंधन तो दिखा देगा, पर बंधन को तोड़ने का विश्वास श्रद्धा से ही आएगा|

ज्ञान झूठ तो दिखा देगा, पर सत्य की समीपता का अनुभव श्रद्धा में ही होगा|

ज्ञान झूठे आसरे हटा देगा, पर सच्चा सहारा श्रद्धा से ही मिलेगा|

श्रद्धाहीन ज्ञान सिर्फ़ तड़प है|

३. संदेह समस्या बनता है, सिर्फ़ आखरी बिंदु पर| वो बिंदु पूर्ण श्रद्धा का होता है| पर आखरी बिंदु पर यहाँ कौन आ रहा है? तो अभी तो संदेह है तो अच्छी बात है| जितना हो सके उतना संदेह करो| और फ़िर उस संदेह को पूरा खत्म होने दो| और याद रखो कि खत्म करने का ये मतलब नहीं हैं कि उसे दबा दिया जाये| खत्म करना मतलब है कि उसकी पूरी ऊर्जा को जल जाने दो| उसमें जितनी आग थी, तुमने जला दी|

अब जल गया, खत्म हो गया|

४. मत पूछो कि मैं करूँ क्या|

पूछो कि मैं हूँ कौन|

५. सारी हिंसा अज्ञान जनित होती है|

जब ज्ञान उठता है, जब बोध उठता है, तो हिंसा का एक प्रकार नहीं, उसके सारे रूप हटते हैं|

जब हिंसा मन से जाती है, तो जितने भी रूपों में अभिव्यक्त होती है, हर रूप से जाती है|

अन्यथा किसी एक रूप पर आक्रमण करते रह जाओगे, और बाकी सारे रूप कायम रहेंगे|

अज्ञान ही हिंसा है।

६. नकली आस्तिक होने से कहीं बेहतर है कि तुम सच्चे नास्तिक हो जाओ और उसके बाद फिर तुम्हें अपनेआप कुछ पता लगना शुरू होता है, वही सच्ची आस्तिकता होती है।

७. जहाँ संग्राम नहीं वहाँ राम नहीं|

जहाँ राम नहीं वहाँ विश्राम नहीं|

विश्राम जीवन के संग्राम से पलायन नहीं है|

विश्राम घोर संग्राम के मध्य भी रामस्थ रहकर है|

जितना गहरा तुमें राम

उतना घोर तुम्हारा संग्राम

और उतना ही शांत तुम्हारा विश्राम

८. मोह भय में मरे, प्रेम चिंता न करे|

९. प्रेम कल की परवाह नहीं करता, वो समझदार होता है, वो अच्छे से जानता है कि कल आज से ही निकलेगा। प्रेम कहता है आज में पूरी तरह से डूबो, आज अगर सुन्दर है तो कल की चिंता करने की ज़रूरत ही नहीं। ये प्रेम का अनिवार्य लक्षण है कि प्रेम आज में जियेगा।

१०. ऐसे हो जाना कि दुनिया तुम्हारे मन में कोई विक्षेप खड़ा ही ना कर सके, यही तुम्हारा धर्म है। विक्षेप माने डिस्टर्बेंस। जो कुछ तुम्हें उत्तेजित करता हो, उद्द्वेलित करता हो, जो कुछ तुम्हारे मन में लहरें खड़ी कर देता हो, उसी से सुरक्षित हो जाना धर्म है।

११. जब तक सुख में सुख मिलेगा, तब तक दुःख में दुःख भी मिलेगा|

१२.  जो अच्छे में खुश होगा, उसे बुरे में दुखी होना ही पड़ेगा|

तो अगर तुम यह चाहते हो कि –

तुम्हें डर न लगे
तुम्हें दुःख न सताए
तुम्हें छिनने की आशंका न रहे
तो तुम पाने का लालच भी छोड़ दो|

१३.  भीतर शून्यता, बाहर तथाता|

१४. आनंद, मन की वो स्थिति है, जिसमें वो अपनी ही मौज में है, जिसमें वो किसी पर आश्रित नहीं है|

ऐसा नहीं है कि उसे दुनिया से कुछ लेन-देना नहीं है|

वो दुनिया में काम कर रहा है, दुनिया में रह रहा है, दुनिया में परिणाम भी आ रहे हैं, पर वो उन परिणामों को बहुत गंभीरता से नहीं ले रहा|

वो उन परिणामों को मन में गहरे नहीं उतर जाने दे रहा|

१५. संसारी – भूल कर करता है|

साधक – याद करके करता है|

सिद्ध – अब कर्ता रहता ही नहीं। वो अब करने के पार चला जाता है।

तो इस सूत्र का तुम्हारे लिए महत्व क्या हुआ? ये कि करते तो तुम हो ही पर ज़रा सुरति के साथ करो, स्मरण लगातार बना रहे। अब जो भी कुछ करोगे उससे तुम्हारी बेड़ियाँ टूटेंगी। भूल में, नशे में, अज्ञान में, जो भी करोगे उससे अपनी ही बेड़ियाँ और मजबूत करोगे। अपने ही बंधन और कड़े करोगे।

और चेतना में, स्मृति में जो भी करोगे, उससे मुक्त होते जाओगे।

१६. जिसका भी जीवन बाहरी पर आश्रित है, उसकी आँखों में सिर्फ़ डर और मूर्खता दिखाई पड़ती है|

१७. पर्दों के पीछे से सत्य न दिखेगा|

१८. गुरु तुम्हें कुछ देता नहीं, वो तुम्हें पैदा करता है|

१९. फर्क नहीं पड़ता कि हमने जीवन के कितने साल बिता लिए हैं, लेकिन डर के मारे हम किसी भी प्रकार के खतरे के करीब भी नहीं गए होते हैं। जो खतरे, जो चुनौतियाँ जीवन अपनी सामान्य गति में भी प्रस्तुत करता रहा है, हम उनसे भी डर-डर कर भागे होते हैं। हमने अपनेआप को लुका-छिपा कर रखा होता है। नतीजा यह होता है कि एक तो हम खौफ में और धंसते चले जाते हैं, और दूसरा यह कि एडवेंचर, रोमांच किसी तरह हासिल करने की हमारी इच्छा बढ़ती जाती है।

२०. जिनका जीवन यूँही चुनौतियों से, और खतरों से हर पल खेल रहा होता है, उन्हें रोमांच की ज़रूरत नहीं पड़ती।

२१. जीवन ऐसा जियो जिसमें पूर्णता पहले ही विद्यमान हो| ताकि तुम्हें कर्म के माध्यम से पूर्णता न तलाशनी पड़े|

जीवन पूर्णता के भाव में जियो|

२२. उत्तेजना की चाह सिर्फ़ एक गलत जीवन से निकलती है।

क्योंकि जीवन में अन्यथा कुछ होता नहीं, इसीलिए आपको उत्तेजना चाहिए होती है।

२३. जब जीवन बेरौनक और रसहीन होता है, तब तुम जानते नहीं हो कि तुम्हारी वृत्तियाँ तुम्हारे साथ क्या-क्या खेल, खेल जाती हैं।

२४. तुम सोचते हो कि अपनी चतुराई में तुम आपदाओं से बचने का उपाय कर रहे हो|

तुम आपदाओं से बचने का इंतजाम नहीं, आपदाओं को ही इकट्ठा करते हो|

जीवन भर खट-खट कर तुम अपने बुढ़ापे के कैंसर के लिए पैसा इकट्ठा करते हो, और देख नहीं पाते कि खट-खट कर तुमने कैंसर ही इकट्ठा कर लिया है|

२५. मन क्या कर रहा है, कहाँ को जा रहा है, इसके प्रति ज़रा सतर्क रहो। कुछ भी यूँही नहीं हो जाता। कुछ भी यूँही नहीं पसंद आता।

जीवन के प्रति ज़रा खुलो। जब मन स्वस्थ होता है तो उसको फिर मिर्च-मसाले की बहुत आवश्यकता नहीं पड़ती।

२६. अहंकार हमेशा द्वंद्व में जीना चाहता है|

सभ्यता ऐसी व्यवस्था है जिसमें अहंकार कायम भी रहे और ऊपर-ऊपर वो द्वंद्व दिखाई भी न दे|

२७. विचार सदा संसार की ओर उन्मुख रहता है| हम दृश्य से बंधे रहते हैं और दृष्टा की ओर ध्यान नहीं दे पाते|

बोध की ओर पहला कदम है कि हम संसार की जगह ज़रा अपनेआप को ध्यान से देखें| यही आत्म ज्ञान है – अपने कर्मों और विचारों का संज्ञान|

और आत्म ज्ञान गहराता जाए तो आत्मबोध होने की संभावना है| वहाँ विचारों की तरंगे निर्विचार के मौन महासमुद्र में शांत होती जाती हैं|

२८. जो संबंध उपजा ही बीमारी से है, वो स्वास्थय कैसे दे सकता है आपको?

जो व्यक्ति आपके जीवन में आया ही प्रपंचवश है, वो प्रेम कैसे दे सकता है आपको?

प्रेम पूर्णता से उठता है, प्रपंच से नहीं|

२९. संसार का अर्थ है – जिसमें आप कभी किसी के हो नहीं सकते। न आप किसी के हो सकते हो, न आप किसी को त्याग सकते हो, आप बस बीच में भटकते रह जाते हो, त्रिशंकु। संसार वह जगह है, जहाँ आपने जिसको पाया, उसको पाया नहीं, और जिसको छोड़ा, उसको छोड़ा नहीं। और पाने और छोड़ने के अतिरिक्त आपने कुछ किया नहीं।

३०. जब तक सुख में सुख मिलेगा, तब तक दुःख में दुःख भी मिलेगा|

३१. साक्षित्व का अर्थ है कि सारे बदलावों के बीच में आप शांत हो|

३२. फूल से किसी का वैर नहीं है। कैसे हो सकता है? मूल की अभिव्यक्ति है फूल। यदि मुझे आपसे प्रेम है तो आपकी अभिव्यक्ति से वैर कैसे हो सकता है मुझे। जो आत्मा के प्रेम में है, उसे शरीर से कैसे बैर हो सकता है। शरीर और है क्या? आत्मा की अभिव्यक्ति ही तो है। जो सत्य को समर्पित है, वो संसार से भाग कैसे सकता है। संसार यूँ ही तो कहीं से नहीं टपक पड़ा है। इस दुनिया में जो कुछ है, वो कहाँ से आया है? उसका स्रोत क्या है? उद्भूत कहाँ से है? उसी एक बिंदु से, शून्यता से। तो हमें संसार से क्या वैर। वैर की तो बात ही छोड़िये, संसार उतना ही पूजनीय है, जितना की संसार का स्रोत।

३३. समस्त द्वैत का आधार है अद्वैत|

३४. संसार को स्थूल दृष्टि से देखना, पदार्थ रूप से देखना नीचता है। और वस्तुओं के, समय के, विस्तार के सत्य को समझना ही उच्चता है।

३५. आध्यात्मिक आदमी वो है जो फूल और शूल को एक समान देखे, क्योंकि निकले तो दोनों मूल से ही हैं।

३६. आत्मा सार है| संसार आत्मा का छिलका है|

अपने जीवन को देखें कि उसमें कितना महत्व है सार के लिए और कितना छिलके के लिए|

३७. जो उचित है, वो करो। नतीजा क्या आता है, छोड़ो।

क्योंकि कोई भी नतीजा आख़िरी कब हुआ है?

३८. मुक्ति का पहला चरण – शरीर का सहज स्वीकार|

३९. सत्य के सान्निध्य से बेहतर कोई विधि नहीं|

४०. जो योजना से नहीं मिला उसे बचाने की योजना मत बनाओ|

४१. सत्य के लिए साहस नहीं सहजता चाहिए|

४२. तुम्हारी धारणाओं का केंद्र है तुम्हारा अहंकार|

४३. आत्म-छवि है मिथ्या; करो आत्मा की जिज्ञासा|

४४. जो बिना मूल्य दिए मिले वो अमूल्य है|

४५. प्रेम बाँटना ही प्रेम पाना है|

४६. मुक्ति व बंधन दोनों ही में रहने के लिए मुक्त है मनुष्य|

४७. दुनिया से पाने की लालसा में तुम वास्तविक से दूर हो जाते हो|

४८. सत्य के अनंत रूपों को सत्य जितना ही मूल्य दो|

४९. एक ही तथ्य है और एक ही सत्य; दूसरे की कल्पना ही दुःख है|

५०. जो संसार से मिले सो समस्या; समस्या का साक्षित्व है समाधान|

५१. जितना लोगे उतना डरोगे, जितना लौटाओगे उतना भयमुक्त होओगे|

५२. परिपक्वता का अर्थ है अनावश्यक से मुक्ति|

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सितम्बर 5, 2016Leave a reply
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प्रेम में नाकामी का यही पुराना बहाना है, खुदा को तो पाना है खुद को भी बचाना है
पिय का मारग कठिन है, जैसे खांडा सोय।
नाचन निकसी बापुरी, घूँघट कैसा होय ।।
– संत कबीर

वक्ता: (श्रोताओं को कहते हुए) आँख बंद करो, बंद ही करे रहना। अब बताओ इस पे क्या-क्या लिखा है? बताओ?

अब आँख खोलो, बताओ इस पे क्या-क्या लिखा है?

(श्रोतागण बताते हुए)

वक्ता: तो सरल है कि कठिन है?

श्रोता: आँख बंद किए हुए हैं तो बहुत कठिन है पर आँख खोल कर तो  सरल है।

वक्ता: घूँघट क्या है?

श्रोता: आँखों पर पर्दा।

वक्ता: सरल है या कठिन है वो निर्भर करता है कि किसकी बात हो रही है—वो जो घूँघट रखने में उत्सुक है या जो नग्न हो जाने के लिए तैयार है। तुम नग्न होने को तैयार हो तो सब सरल है। और तुम्हारी अभी ठसक बहुत गहरी है, घूँघट रखना है, लोक-लाज, इज्ज़त-शर्म तुम्हारे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं,  तो बहुत कठिन हैं।

जब कहा जाए सरल है तो समझ लीजिए कि कहा जा रहा है कि – तुम चाहो तो सरल है। जब कहा जाए कि कठिन है तो समझ लीजिए कि कहा जा रहा है कि – तुम जितना कठिन चाहो उतना बना सकते हो। सब तुम्हारे ऊपर है। सरल अतिसरल है और महाकठिन है – जैसी आपकी मर्ज़ी।

अहंकार है, मूर्ख बने रहने की आज़ादी;
साथ ही साथ, अहंकार खुद को विगलित करने की आज़ादी भी है।

तुम सब कुछ हो—आँख बंद कर लो तो घना अँधेरा और आँख खोल लो तो दिव्य ज्योति।

चाहो जो जीवन भर मुर्ख से मुर्ख, पागल से पागल रह जाओ और चाहो तो आज ही बुद्ध हो जाओ। बात तुम्हारे चाहने की है। जो चाहो सो पाओगे। परम के बच्चे हो, जो चाहोगे सो पाओगे। जब वो परममुक्त है, तो परममुक्त तुम भी हो। तुम बंधन में रहने के लिए भी मुक्त हो। मांग के देखो, मिलेगा। ये मान के देखो कि मिला ही हुआ है तो मांगने की भी ज़रूरत नहीं पड़ेगी। पर न मांगो, और न मानो, बस रोओ और कल्पो तो उसकी भी पूरी अनुमति है।

अस्तित्व में कुछ वर्जित नहीं है। तुम अपना सर फोड़ लो, अस्तित्व आकर के तुम्हारे हाथ नहीं पकड़ेगा। कभी देखा है कि तुम शांत से शांत जगह पर हो और वहाँ भी तुम अपना उपद्रव लेकर के गए हो और शोर मचा रहे हो तो अस्तित्व आकर न तुम्हारा मूंह बंद करता है न तुम्हारे हाथ पकड़ता है। तुम्हें पूरी आजादी है। तुम जितनी नालायकी करना चाहते हो करो, पूरी आज़ादी है। बस कर्म का सिद्धांत अपना काम करता रहेगा। क्या है कर्म का सिद्धांत? करने की पूरी आज़ादी है, पर कर्म कर के कर्मफल न मिले बस ये उम्मीद मत रखना। करा है तो भरोगे ज़रूर।

हम गए थे पहाड़ो पर, कोई ऐसी जगह थी जहाँ चिप्स के पैकेट, पानी की बोतलें और शराब की बोतलें न बिखरी पड़ीं हों? तुम पहाड़ पर बैठ कर चिप्स खाओ, मैगी खाओ, सिगरेट पियो, शराब पियो और गंदगी फैलाओ तो पहाड़ आकर के तुम्हारे हाथ थोड़े ही रोक लेता है या पकड़ लेता है? सुन्दर पहाड़, उनपर बादल तैर रहे हैं और तुम्हें वहाँ भी गंदगी ही फैलानी है तो करो, पूरी आज़ादी है। पहाड़ों से ज़्यादा मैगी पॉइंट  कहीं नहीं होते। पूरी आजादी है।

पहाड़ों पर काम वासना जितना ज़ोर मारती है उतना और कहीं नहीं। उसी हिमालय पर ऋषियों को राम मिल गया, उसी हिमालय पर तुम्हारे लिए बस काम-काम-काम है, तो भी तुम्हें आज़ादी पूरी है। जहाँ तुम्हें काम वासना के आलावा कुछ सूझ नहीं रहा वहाँ से थोड़ी ही दूरी पर कोई ऋषि, कोई संत, कोई कृष्णमूर्ति चुप-चाप बैठा बस देख रहा होगा—आजादी पूरी है।

उसी गंगा में तुम इस भाव से भी जा सकते हो कि पानी छप-छ्पाएँगे, उत्पात मचाएँगे, राफ्टिंग करेंगे और साथ-साथ नहाने का मज़ा ही कुछ और है; उसी गंगा तट पर बहुतों को समाधि भी उपलब्ध हो गई। आज़ादी पूरी है, तुम्हें जो करना है गंगा का सो कर लो। कई लोग गंगा में डुबकी मारते समय पेशाब भी कर देते हैं तो गंगा उनको रोकने थोड़ी न आती है। मज़ा है इसी बात का कि, ‘ठंडे-ठंडे पानी में हमने पेशाब कर दिया, बहते पानी में।’ मैदानों में ऐसा करने को नहीं मिलता। बड़ी ठंडक लगी, बड़ा आनंद आया।

आपकी मर्ज़ी है साहब, आपसे बड़ा कौन है! जो चाहे कीजिये।

लेकिन जो नाचने निकला हो उसे घूँघट नहीं रखना होगा; नाचने का अर्थ समझते हो? कबीर हमारे वाले नांचने की बात नहीं कर रहे हैं कि, ‘आज मेरे यार की शादी है’

कबीर किस नाचने की बात कर रहें हैं?

कबीर उस नाच की बात कर रहें हैं, जो नटराज का नृत्य है, जिसमें अनहद की ताल पर अस्तित्व नाचता है, या तो चिड़ियों का चेहचाहनाऔर मोर का नाचना—कबीर उस नाच की बात कर रहे हैं। नाचना है अगर शिव की तरह, तो आँखे खोल लो, बाकी आज़ादी पूरी है, लेकिन यदि कामना नाचने की है तो आँखें खोल लो, फ़िर नाचोगे, पूरा-पूरा नाचोगे।

छोटे-छोटे कीड़े भी नाच रहे हैं, तितली नाच रही है। कुछ ऐसा नहीं है जो नहीं नाच रहा। नाचना स्वभाव है । शिव सूत्र कहते हैं कि—आत्मा नर्तक है।  इससे सुन्दर बात कही नहीं जा सकती। शिव सूत्र कहते हैं कि, आत्मा नर्तक है और मन रंगमंच है जिसपर आत्मा नांचती है। वही बात यहाँ कबीर कह रहे हैं —नाचन निकसी बापुरी।

मन क्या है?

आत्मा के नृत्य की अभिव्यक्ति।

जीवन वही हुआ, जो नाचता हुआ हो, उसी को लीला कहते हैं; नाचता हुआ जीवन ही लीला है।

ठहरा-ठहरा, सूना-सूना, थका-थका नहीं है बल्कि नाचता हुआ।

हज़ार मुद्राएँ, ज़बरदस्त लचक, उर्जा का बहाव, लयबद्धता, संगीत—यह है नाच।

तो जिन्हें नाचना हो वो घूँघट हटाएँ; घूँघट क्या हटाएँ,  पूर्ण नग्न हो जाएँ। सिर्फ घूँघट नहीं बल्कि पूर्ण नग्नता। और जिन्हें जन्म गंवाना हो, शिकायतें भर करनी हो उनके लिए तो प्रिय का मार्ग कठिन है ही। वो शिकायतें करें, क्या शिकायतें करें—’अरे बड़ा कठिन है, हमसे नहीं होगा हम साधारण लोग हैं। हमें तो यह बताओ कि आलू कितने रूपए किलो चल रहा है।’ प्रिय का मार्ग तो बहुत कठिन है। तुम पर निर्भर करता है।

कल इसीलिए जब एक सवाल पूछा था तो उसके उत्तर में मैंने कहा था कि—सद्विचार। यही है सद्विचार। मुक्ति चाहिए, सत्य जानना है—ये सदविचार है। उठे विचार पर सद्विचार उठे।

सद्विचार क्या है ?

जो मुक्ति की दिशा में ले जाए ;
जो प्रेम बढाए ;
जो दूरी कम करे।

सच्चाई जाननी है—सद्विचार है; झूठ में नहीं रहना है— ये सद्विचार है। इनके अतिरिक्त जितने भी विचार हैं वो सब दूरी बढ़ाने वाले और अहंकार के विचार हैं, अहंकार बढाने वाले विचार हैं। विचार करो, पर —सद्विचार।

अमृतबिंदु उपनिषद में बहुत महत्वपूर्ण सूत्र आता है—जो मुक्ताभिमानी है वो मुक्त है और जो बंधाभिमानी है वो बंधा हुआ है। जो अपने आप को बंधन में जाने सो ही बंधा हुआ है और जो अपने आप को मुक्त जाने सो मुक्त है। बंधन है कहाँ? तुम्हारी सोच बंधन है। मैं तुमसे कहूँ कि बंधन दिखाओ अपना, लेकर आओ बंधन कहाँ है। चलो उसे काटते हैं; मैं गंडासा लेकर खड़ा हूँ अभी काटेंगे तुम्हारे बंधन को, चलो लेकर के आओ उसे।

तुम बोलते हो कि नहीं मैं तो हज़ार बंधनों में बंधा हुआ हूँ, मैं पूछता हूँ कि दिखाओ बंधन कहाँ है? तुम्हारी सोच के अलावा वो बंधन कहाँ हैं? और यदि सोच लो कि मुक्ति पानी है तो मुक्ति ज़रा भी दूर है ही नहीं। जिसने चाहा कि सत्य में जियूँगा तो हो नहीं सकता कि सत्य उसे मिल न जाए, और जितनी गहरी तुम्हारी चाह उतनी जल्दी उपलब्धि।

चाह यदि अथाह हो तो उपलब्धि तुरंत, तत्क्षण।

~ ‘शब्द योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: Acharya Prashant,Kabir:प्रेम में नाकामी का यही पुराना बहाना है,खुदा को तो पाना है खुद को भी बचाना है

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १: माया की स्तुति में रत मन सत्य की निंदा करेगा ही

लेख २: उचित विचार कौन सा?

लेख ३: केंद्र पर है जीवन शांत, सतह पर रहे तो मन आक्रांत

सम्पादकीय टिप्पणी:

कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।

प्रौद्योगिकी युग में थपेड़े खाते हुए मनुष्य के उलझे जीवन के लिए ये पुस्तक प्रकाश स्वरुप है।

गगन दमदमा बाजिया

kbir

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अगस्त 30, 2016Leave a reply
32
अगर सभी बुद्ध जैसे हो गये तो इस दुनिया का क्या होगा?
32

श्रोता: सर, अगर सब लोग ही इस दुनिया में बुद्ध के जैसे हो गए तो फिर ये दुनिया कैसे चलेगी?

वक्ता: कौन सी दुनिया? ‘इसके’ अलावा कोई दुनिया जानते हो? ये  सब चलना बंद हो जाएगा जो अभी चल रहा है। ये बात कितनी खौफनाक लग रही है कि—रोज़ सुबह मुझे कोई तंग नहीं करेगा, रोज़ रात कोई मुझपर हावी नहीं होगा, रोज़ मेरा खून नहीं चूसा जाएगा, मेरा चेहरा लटका हुआ नहीं रहेगा—कितनी भयानक बात है न! हे भगवान! ये दुनिया चलनी बंद हो जाएगी।

(सभी हँसते हैं)

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