5 बुरे काम में देर करनी चाहिये

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महर्षि गौतम  के पुत्र का नाम था चिरकारी। वे बुद्धिमान थे, कार्यकुशल थे, किंतु प्रत्येक कार्य को बहुत सोच- विचार करने के पश्चात करते थे। उनका स्वभाव ही धीरे धीरे करने का हो गया था। जब तक किसी कार्य की आवश्यकता ओर औचित्य उन की समझ में नहीं आ जाता था तब तक वे कार्य प्रारंभ ही नहीं करते थे। केवल उस कार्य के सम्बंध मे विचार करते रहते थे। बहुत से लोग उनको इस स्वभाव के कारण आलसी समझते थे

 एक बार महर्षि गौतम किसी कारण से अपनी पत्नी से नाराज हो गये। क्रोध में आ कर उन्होंने चिरकारी को आज्ञा दी---बेटा! अपनी इस दुष्टा माता को मार डालो।' यह आज्ञा देकर महर्षि वन में चले गए।


 अपने स्वभाव के अनुसार चिरकारी  ने विचार करना प्रारंभ किया--- मुझे क्या करना चाहिए। पिता की आज्ञा का पालन करने पर माता का वध करने पड़ेगा ओर माता का वध न  करने पर पिता की आज्ञा का उल्लंघन होगा।पुत्र के लिये माताओर पिता दोनों दोनों पूज्य हैं। दोनों में से किसी की भी अवज्ञा करने सेपुत्र पाप का भागी होता है। कोई भी माता का नाश करके सुखी नहीं हो सकता। पिता की आज्ञा टाल कर भी सुख ओर कीर्ति नहीं मिल सकती। मेरी माता में कोई दौष है या नहीं, यह सोचना मेरे लिए अधर्म है। इसी प्रकार पिता की आज्ञा भी उचित है या नहीं, यह सोचना मेरे अधिकार में नहीं। 
        चिरकारी तो ठहरे ही चिरकारी। वे चुपचाप हाथ मे शस्त्र लेकर बैठे रहे और सोचते रहे। किसी भी निश्चय पर उनकी बुद्धि पहुंचती नहीं थी ओर बुद्धि के ठीक--ठीक निर्णय किये बिनकोइ काम करना उन के स्वभाव में नहीं था। 
  उधर वन में जाने पर जब महर्षि गौतम का क्रोध शांत हैतब उन्हें अपनी भूल ज्ञात हुई। वे बहुत दुखी हो कर सोचने लगे--मैने  आज कितना बड़ा अनर्थ किया। अवश्य मुझे स्त्री वध का पाप लगेगा। मेरी पत्नी तो निर्दोष है। क्रोध में आ कर मैने बिना विचारे ही उसको मार डालने का आदेश दे दिया। कितना अच्छा हो कि चिरकारी अपने नाम को आज सार्थक करे। 
          महर्षि शीघ्रतापूर्वक आश्रम की ओर लौटे। उन को आते देख कर चिरकारी ने लज्जा से शस्त्र छिपा दिया और उठ कर पिता के चरणों मे प्रणाम किया। महर्षि ने अपने पुत्र को उठाकर ह्रदय से लगा लिया ओर सब वृतांत जानकर प्रशन्न हृदय से उसको आशीर्वाद दिया। वे चिरकारी को उपदेश देते हुए बोले--- हितैषी का वध ओर कार्य का परित्याग बहुत सोच- समझ कर करना चाहिए। क्रोध अभिमान किसी का अनिष्ट अप्रिय तथा पापकर्म करने में अधिक से अधिक विलम्ब करना चाहिए। किसीके भी अपराध करने पर उसे शीघ्र दण्ड नहीं देना चाहिए। बहुत सोच समझ कर दण्ड देना चाहिए। 
        

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