19 न समर्थन, न निषेध।

Share:

आचार्य प्रशान्त – उद्गार मौन के

Advertisements

Report this ad

न समर्थन, न विरोध

साधु ऐसा चाहिए, दुखै दुखावे नाहि। 
पान फूल छेड़े नहीं, बसै बगीचा माहि।। 

वक्ता: कल रात में जो लोग साथ थे, उनसे एक बात कही थी कि ‘त्याग कहता है, ‘न सुख, न दुःख’ और बोध कहता है, ‘जब सुख, तब सुख और जब दुःख, तब दुःख’।

एक बार एक ज़ेन साधक से किसी ने पूछा कि जब सर्दी लगे, जब गर्मी लगे, तो क्या करें? सर्दी-गर्मी से मुक्ति का क्या उपाय है? तो ज़ेन साधक ने उत्तर दिया, ‘जब गर्मी लगे, तो गर्म हो जाओ, और जब सर्दी लगे, तो सर्द हो जाओ’। यही उपाय है- गर्मी में गर्म, और सर्दी में सर्द। बदलने की कोशिश मत करो, छेड़ने की कोशिश मत करो।

जगत प्रकृति के नियमों के आधीन है, और सत्य की छाया मात्र है, वह प्राथमिक नहीं है। इससे छेड़खानी का कोई औचित्य नहीं है, ये मूल है ही नहीं। किसी पेड़ की शाखों, पत्तियों को कुतरने से क्या होगा? मूल है अगर, तो हजार पत्तियां, हजार शाखाएं बार-बार निकलती ही रहेंगी। इनसे लड़ने से क्या होगा? ये महत्वपूर्ण हैं ही नहीं।

समझदार व्यक्ति संसार को इतना भी महत्व नहीं देता कि वो उसका परित्याग करे। उसे ये भी नहीं करना है कि सुख आ रहा है, तो सुख का त्याग कर दे, या दुःख आ रहा है तो दुःख को भोगने से बचे, उसे ये नहीं करना। वो कहता है, ‘इनको महत्व ही क्यों देना? ये कह कर के कि मैं फलानी वस्तु का त्याग करना चाहता हूं, मैं उस वस्तु को ज़रुरत से ज़्यादा महत्वपूर्ण बना देता हूँ। तेरा इतना भी महत्व नहीं है कि मैं तुझे त्यागूँ’। बात समझिएगा।

जब त्यागी कहता है कि मुझे कुछ त्यागना है, तब उसके मन में दिन-रात वही वस्तु चलती है जिसे उसे त्यागना है। आप तय कर लो कि आपको अपना अपना वज़न त्यागना है, और यहाँ पर कई लोगों ने ऐसा तय किया होगा कई मौकों पर, अपनी ज़िंदगी में। आप ये तय कर लो कि आपको दस किलो वज़न कम करना है, अगले छः महीने के भीतर, तो छः महीने तक आपके दिमाग में सिर्फ़ वज़न ही वज़न घूमेगा। अब ये बड़ी मज़ेदार बात है। जो त्यागना है, वही दिमाग में घूम रहा है क्योंकि अब वह महत्वपूर्ण हो गया, अब वह महत्वपूर्ण हो गया। ये सहजता नहीं है।

जिन भी धर्मों ने ये सिखाया है कि ये न करो, वो न करो, ये त्यागो, ऐसा आचरण रखो, उन्होंने अंततः यही पाया कि त्यागा कुछ जा ही नहीं सकता, हाँ दमन किया जा सकता है, पर दमन से कोई लाभ नहीं होगा।

जब आप कहते हो, कोई वस्तु त्याग दो, तो आप यही बता रहे हो कि ये महत्वपूर्ण है, और इसीलिये जिसको आप बता रहे हो, उसके मन में लालच पैदा कर रहे हो। उदहारण के लिये, आप अगर किसी को बताओ कि शराब बुरी चीज़ है, उसको त्याग दो, तो आपको अच्छे से पता होना चाहिये कि आपने उसके मन में शराब के प्रति लालच पैदा कर दिया है। ‘ये मत्वपूर्ण बात होगी, तभी तो त्यागी जा रही है’।

जब आप कहेंगे कि शराब त्याग दो, तो फिर आपको ये भी कहना पड़ेगा कि जब मरोगे और जन्नत जाओगे, तो वहाँ पर शराब के दरिया बह रहे होंगे, तभी तो वो त्यागेगा। ‘कोई बड़ी चीज़ है, तभी तो त्यागनी है। बड़ी चीज़ है, तो देनी पड़ेगी न?’ आप ही ने सिद्ध कर दिया कि बड़ी चीज़ है।

‘स्त्रियाँ बुरी हैं, कंचन-कामिनी हैं, इन्हें त्याग दो। इनकी ओर देखना नहीं, भ्रष्ट कर देंगी, नरक का द्वार हैं। अगर तुमने इन्हें त्याग दिया, अगर तुमने स्त्रियों को त्याग दिया, तो फिर, मेनका और उर्वशी मिलेंगी’। तर्क देखिये, अगर तुमने स्त्रियों को त्याग दिया, तो तुमको अप्सराएं मिलेंगी। स्त्रियों को त्यागो, ताकि स्त्रियाँ मिलें। आप बड़े होशियार हैं! पर ये आपको करना पड़ेगा, क्योंकि त्यागने का अर्थ ही है कि वो वस्तु, वो व्यक्ति, महत्वपूर्ण है। महत्वपूर्ण है। ‘महत्वपूर्ण है, तो लाओ, दो, कभी न कभी तो देना पड़ेगा’।

साधु ऐसा चाहिए, दुखै दुखावे नाहि। 
पान फूल छेड़े नहीं, बसै बगीचा माहि।। 

यहाँ कुछ भी इतना महत्वपूर्ण नहीं है कि उसके साथ छेड़खानी की जाए। न आकर्षण, न विकर्षण। छेड़खानी की ज़रुरत ही नहीं है, जो जैसा है, सो है। इसी को बौद्धों ने ‘तथाता’ कहा है, ‘जो जैसा है सो है’। छेड़खानी क्या करनी है?

सुख आए, सुखी हो लो। अरे कौन सी बड़ी बात हो गई? हंसी आ रही है, हंस लो। दुःख आए, जी भर के दुखी हो लो। अरे कौन सी बड़ी बात हो गई? ‘न सुख मेरा स्वाभाव है, न दुःख मेरा स्वाभाव है, ये तो यूं ही हैं, हम इन्हें भाव देते ही नहीं। ये आए, तो हमने इन्हें गुज़र जाने दिया। हम इनका प्रतिरोध भी क्यों करें? हम इन्हें त्यागें भी क्यों?’

पान फूल छेड़े नहीं, बसै बगीचा माहि।

छेड़ने जैसी हमारी कोई इच्छा नहीं है, कुछ बदलने का हमारा कोई इरादा ही नहीं है। असाधारण होने की हमारी कोई लालसा नहीं है। जैसा है सो है, और यही अपने आप में सबसे असाधारण बात है, क्योंकि असाधारण तो हर कोई होना चाहता है, और वो बड़ी साधारण बात है।

नानक एक गांव में गए, वहाँ के लोगों ने पहले ही अपनी छवि बना रखी थी कि हम तो बड़े ज्ञानी हैं, और ये कोई और साधु चला आ रहा है, हमें इसकी बात सुनने कि ज़रुरत नहीं है। तो जब नानक गांव की सीमा पर पहुँचे, तो उन लोगों ने शिष्टतापूर्वक नानक को संदेस भिजवाया। उन्होंने एक बड़ा पात्र भिजवाया, एक द्रव्य से भर कर, दूध रहा होगा, पानी रहा होगा, पूरा ऊपर तक भरा हुआ। एक बूंद भी उसमें, दूध या पानी के लिये, कोई जगह शेष नहीं। वो उन्होंने नानक को भिजवाया। समझदार को इशारा काफी, नानक समझ गए कि वो लोग क्या कहना चाहते हैं कि ‘हम भरे हुए हैं। हमारे पास अब जरा भी जगह नहीं है तुम्हारे लिये’। नानक ने एक छोटा-सा पत्ता उठाया, नीचे से, और उस पात्र में तैरा दिया, और लौटा दिया।

गांव के लोग इतने भी बेवकूफ न थे, इशारा समझ गए कि ‘मैं तुम्हारा बोझ बढ़ाने नहीं आया हूं, मैं तुम्हारा स्थान घेरने नहीं आ आया हूं। मैं तो ऐसे जीता हूं, तैरता हुआ। मेरा कोई अपना अस्तित्व ही नहीं है। मेरा कोई इरादा नहीं है किसी को बाहर करने का, कोई बदलाव करने का। मैं तो अस्तित्व की गोद में तैर रहा हूं’।

पान फूल छेड़े नहीं, बसै बगीचा माहि।।

जो उग रहा है, उसे उगने दो। जो गिर रहा है, उसे गिरने दो। तुम बीच में अपना कर्ताभाव न लेकर आओ। बगीचा है, प्रकृति है, इसमें प्रकृति के सारे खेल लगातार, निरंतर, सामानांतर चल रहें हैं। तुम इन सभी खेलों के साक्षी मात्र रहो। हर्ष आएगा, शोक आएगा, तुम किसी को जीवन लेता देखोगे, तुम किसी की मृत्यु भी देखोगे, जीवन में किसी का प्रवेश होगा, तो किसी की विदाई भी होगी।

‘इस घर की यह रीत है, इक आवत इक जात’, तुम इन सब के साक्षी रहो, इन सब से गुज़र जाओ। तोड़-मरोड़ की कोशिश न करो। ये तोड़-मरोड़ की कोशिश ही तुम्हारी विक्षिप्तता है। इसी को कह रहें हैं कबीर, ‘दुखै दुखावे नाहि’। ये तोड़-मरोर की कोशिश ही दुःख है।

बाहर-बाहर जो प्रकृतिस्थ हो लेता है, वही भीतर-भीतर समाधिस्थ हो सकता है।

बाहर-बाहर पूरी तरह प्रकृति को अंगीकार कर लो, तभी भीतर से समाधि पाओगे। हमने पूरी कोशिश करी है प्रकृति से लड़ने की। क्योंकि हम प्रकृति से लड़ते हैं, इसीलिये हम समाधि को भी उपलब्ध नहीं हो पाते हैं। प्रकृति को अपना काम करने दो।

समझ सकते हैं, देख रहे होंगे की कबीर ने दुःख को परिभाषित भी कर दिया यहाँ पर। संसार के निरंतर प्रवाह को बदलने की कोशिश, उससे छेड़खानी की कोशिश, यही दुःख है, और कुछ दुःख नहीं होता। संसार चलायमान है, और हम कोशिश क्या करते हैं? उसमें अचल को खोज लेने की।

तुम्हें किसी से प्रेम होता है, तुम क्या कोशिश करते हो? कि अब इस रिश्ते को अचल बना दूं, ये हिले न। फिर तुम उस रिश्ते को हज़ार तरीकों से बांधने की युक्तियाँ लगाते हो, तुम सामाजिक ठप्पे लगाते हो। तुम कहते हो, ‘मैंने विवाह कर लिया’। तुम उस पर और कई प्रकार के मानसिक पहरे बैठाते हो। यही छेड़खानी है प्रकृति के बहाव से, और ये सबसे बड़ी मूढ़ता है और अपने प्रति गुनाह भी है। क्या? कि जो चलायमान है, उसकी चाल को रोकने की कोशिश करना, उसे अचल बनाना कि जैसे प्रेम को विवाह बना दें, और दूसरा, जो अचल है, उसको चलायमान जगत में स्थापित कर दें। यही दोनों मूल गुनाह हैं, और यही दोनों, हमारे सारे कष्टों का कारण हैं।

जिसे जाना ही है, हम वहाँ पर अपरिवर्तन खोजते हैं, और जो अपरिवर्तनीय है, उसे हम विनाशी दुनिया में स्थापित कर देते हैं। यही दोनों पाप हैं। यही हमारी विपरीत बुद्धि है। जहाँ चला-चली का मेला है, वहाँ पर हम कुछ ऐसा खोजते हैं जो कभी हमसे बिछुड़े न, और फिर जब वो हमसे बिछुड़ जाता है, तो हमें बड़ा दुःख होता है।

संसार में हमारी जितनी चेष्टाएं हैं, उन सारी चेष्टाओं के पीछे हमारी यही इच्छा तो है कि कुछ ऐसा मिल जाए जो छिने न। कम से कम शरीर को लेकर तो यही आकांक्षा रहती है कि शरीर कभी हमसे छिन न जाए, रिश्तों को लेकर भी यही रहती है। जब कुछ मन चाहा मिल गया, तो अब ये कभी हमसे छिने न, कम से कम सात जन्मों तक रहे, ये पाप है। जहाँ पर धर्म का ये अर्थ लगाया जाता हो कि अग्नि के फेरे लेकर, ये कसम खाओ कि हम जन्मों-जन्मों तक साथ रहेंगे, उस साथ की तो शुरुआत ही पाप की बुनियाद पर हुई है, क्योंकि आप उसको रोकने की कोशिश कर रहे हो, जो रुक सकता नहीं। आप परमात्मा की योजना में विघ्न डाल रहे हो।

जो बनाया ही ऐसा गया है कि वो चलता रहे, बदलता रहे, वहाँ पर आप बदलाव को रोकने की कोशिश कर रहे हो। वहाँ आप कह रहे हो की, ‘हम आजीवन साथ रहेंगे’। आजीवन क्या साथ रहना है तुम्हारे? कुछ है जो आजीवन साथ रहा है? क्या तुम ही आजीवन अपने साथ रहे हो? तुम ही प्रतिपल बदल रहे हो, पर देखो तुम चेष्टा क्या करते हो कि कुछ और हो जो आजीवन हमारे साथ रहे। आजीवन भी साथ रहे, अगले जन्म भी साथ रहे, यही पाप है। और जो निरंतर तुम्हारे साथ है, इस पूरी कोशिश में, तुम उसको भूल जाते हो।

जब किसी बाहरी वस्तु को, या व्यक्ति को, तुम आजीवन साथ रखना चाहते हो, तो सबसे पहले तुम उसको भूलते हो, जो तुम्हारे साथ है ही, वो भूला जाता है। अपने असली साथी को भुला कर, तुम बाहर नकली साथी खोजते हो, और वहाँ स्थायित्व की मांग करते हो, यही पाप है।

दुःख आकांक्षा है, दुःख प्रतिरोध है।

दोनों बातें कह रहा हूं। आपको उनमें कहीं कोई असामंजस्य न दिखाई दे। जब हम बोध-शिविर में थे, तो मैंने कहा था कि, उपनिषद की बुनियाद में एक विद्रोह बैठा होता है। याद है हमने क्या कहा था? ‘मुक्ति का आरंभ होता है ‘न’ से (फ्रीडम बिगिन्स विद अ ‘नो’)’, और यहाँ मैं आपसे बात कर रहा हूं अप्रतिरोध की। आप कहेंगे, ‘ये क्या बात है, वहाँ तो आप बार-बार कह रहे थे कि विरोध करो, और यहाँ आप कह रहे हैं अप्रतिरोध। कभी विरोध, कभी अप्रतिरोध, ये क्या है?’

मैं कह रहा हूं, ‘सत्य के प्रति गहरा अप्रतिरोध, और झूठ का पूर्ण विरोध’। दोनों एक ही बात हैं।

अहंकार झूठ है। वो जहाँ उठे, वहाँ विरोध। आकर्षण, आसक्ति झूठ है। वो जहाँ उठे, वहाँ विरोध, पर अहंकारहीन प्रकृति सत्य की उत्पत्ति है, उसका कोई विरोध नहीं। ये बात सूक्ष्म है, इसको समझिएगा। मैं आसक्ति का विरोध करता हूं, शरीर का नहीं, शरीर का गुलाम हो जाने का विरोध करता हूं। शरीर का गुलाम नहीं होना है, इसका अर्थ ये भी नहीं है कि शरीर को अपना गुलाम बना लेना है। शरीर को उसका काम करने देना है।

न शरीर से आसक्ति, न शरीर से विरक्ति। शरीर प्रकृति है, प्रकृति अपना काम खूब जानती है। आपको किसी तरीके का दखल देने की ज़रुरत नहीं है।

‘पान फूल छेड़े नहीं…’,पान-फूल : प्रकृति। आप न छेड़े, वो अपना काम जानती है। न आप उसका समर्थन करिये, न आप उसके विरोध में खड़े होइये। वहाँ तो अप्रतिरोध है, जो हो रहा है, वो प्रकृति है। ‘मैं’, शरीर कभी ‘मैं’ नहीं बोलता। या बोलता है? जब विरोध करने की बात आती है, तो मैं उसकी ओर इशारा कर रहा हूँ जो आपके भीतर बैठा है और ‘मैं, मैं, मैं’ करता रहता है, वो झूठा है। वही दुःख का कारण है, और वो कुछ भी करवा सकता है। वो किसी का भी विरोध करवा सकता है। वो मात्र परमात्मा का ही विरोध नहीं करवाता आपसे, वो शरीर का भी विरोध करवाता है। ये जो तथाकथित धार्मिक आदमी होता है हमारा, ये सिर्फ अपने अहंकार के समर्थन में होता है। ये परमात्मा का भी विरोध करता है, और प्रकृति का भी विरोध करता है।

आप गौर से देखियेगा, आपके ये जो तथाकथित धार्मिक लोग होते हैं, ये परमात्मा का भी विरोध करते हैं और प्रकृति का भी करते हैं। ये प्रकृति का विरोध कैसे करते हैं? नैतिकता के माध्यम से। ‘ये न करो, वो न करो, इससे न मिलो, उससे न मिलो, इतने बजे खाओ, इतने बजे उठो, दैहिक सम्बन्ध इससे ही बनाओ, उससे न बनाओ’, ये प्रकृति का विरोध है। और ये परमात्मा का विरोध कैसे करते हैं? धर्म के माध्यम से, कि आध्यात्मिकता को नष्ट करो, और एक थोथा धर्म थोप दो।

आध्यात्मिक व्यक्ति, जो व्यक्ति सत्य में जीता है, उसका शरीर से, और संसार से, कोई विरोध नहीं होता, कोई समर्थन भी नहीं होता। वो कहता है, ‘ये इतने महत्वपूर्ण हैं ही नहीं कि इनका विरोध या समर्थन किया जाए’। आप ये मत समझिएगा कि उसे सुख या दुःख प्रभावित नहीं करते। अगर आपसे ये कहा गया है कि आध्यात्मिक आदमी को सुख-दुःख नहीं लगते, आपको गलत कहा गया है। उसे सुख पूरा-पूरा लगता है, उसे दुःख भी पूरा-पूरा लगता है। उस दिन कह रहा था न मैं कि ‘जब वो हंसेगा, तो बोधिधर्म की तरह हंसेगा, अट्टाहस। उसे दुःख भी पूरा-पूरा लगता है। मीरा जैसे रोई, या राबिया जैसे रोई, हम कहाँ रोते हैं? उसे दुःख भी पूरा-पूरा लगता है। उसे प्रकृति से छेड़खानी करनी ही नहीं है।

हम परमात्मा, और परमात्मा की प्रकृति, दोनों के विरोध में हैं। हमने मंदिरों को भी नष्ट किया है, और हमने प्रकृति को भी नष्ट किया है। मंदिर हमारे भ्रष्टाचार के केंद्र हैं, और प्रकृति को हमने पूरी तरह उजाड़ दिया है। हमने शेष रखा है तो मात्र अपना अहंकार।

आप देखियेगा, जिस व्यक्ति की परमात्मा में श्रद्धा नहीं, उसे प्रकृति भी पसंद नहीं आएगी, और जिसे प्रकृति में शीतलता मिलने लग गई, वो आध्यात्मिक हो गया। अब उसे राम नाम जपने की ज़रुरत नहीं है, उसे प्रकृति भाने लगी है, यही आध्यात्म है। झरने में उसे अनहद सुनाई देगा, तारों के मद्धम प्रकाश में उसे रास्ता दिखाई देगा, पक्षियों का कलरव उसका संगीत हो जाएगा। हर जगह उसे परमात्मा की ही गूंज सुनाई देगी। हर जगह उसे परमात्मा के ही पदचिन्ह दिखाई देंगे। यही आध्यात्मिकता है।

सम्पूर्ण प्रकृति परमात्मामय है, यही तो आध्यात्मिकता है। प्रकृति और परमात्मा साथ हैं। इनसे छिटका हुआ है, तो बस अहंकार।

-‘बोध-सत्र’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें:https://www.youtube.com/ watch?v=2_tJYadia6Q

Advertisements

Report this ad

इसे साझा करें:

Click to share on Twitter (नए विंडो में खुलता है)Share on Facebook (नए विंडो में खुलता है)Click to share on WhatsApp (नए विंडो में खुलता है)Click to share on LinkedIn (नए विंडो में खुलता है)Click to share on Google+ (नए विंडो में खुलता है)Click to share on Pinterest (नए विंडो में खुलता है)Click to share on Reddit (नए विंडो में खुलता है)Click to share on Tumblr (नए विंडो में खुलता है)Click to share on Skype (नए विंडो में खुलता है)Click to share on Pocket (नए विंडो में खुलता है)Click to email (नए विंडो में खुलता है)Click to print (नए विंडो में खुलता है)Click to share on Telegram (नए विंडो में खुलता है)

Related

क्या एकाग्रता ध्यान में सहयोगी है?In "संवाद"

गहरा प्रेम, गहरा विरोधIn "संवाद"

मृत्यु में नहीं, मृत्यु की कल्पना में कष्ट हैIn "संवाद"

मार्च 6, 20152 Replies« पिछलाअगला »

Advertisements

Report this ad

एक उत्तर दें

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

टिप्पणी 

नाम*

ईमेल*

वेबसाईट

 Notify me of new comments via email.

Surya पर मार्च 28, 2015 को 11:40 पूर्वाह्न

Nice comment sir that go with the wind and accept the nature, being enlighten does not mean that you are above from happiness and sorrowfulness. As long as you are breathing they will come like a two side of a coin.

Indeed a real eye opener and insight blog that spiritually does mean that you are above nature.

Like

प्रतिक्रिया

Advertisements

Report this ad

Acharya Prashant (आचार्य प्रशांत) पर जुलाई 7, 2017 को 11:24 पूर्वाह्न

प्रिय सूर्य जी,

प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन! यह चैनल प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों द्वारा संचालित किया जाता है एवं यह उत्तर भी उनकी ओर से आ रहा है | बहुत ख़ुशी की बात है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहें हैं| फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:

1. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार: यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है। इस विलक्षण अवसर का लाभ उठाने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91-9818585917

2: अद्वैत बोध शिविर: प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन द्वारा आयोजित अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अलौकिक अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित ३५+ बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।

इसके अतिरिक्त, हम बच्चों और माता-पिता के रिश्तों में प्रगाढ़ता लाने हेतु समर्पित बोध-शिविर का आयोजन करते हैं। इन शिविरों का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661

3. आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण: आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं। सत्र का हिस्सा बनने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com या संपर्क करें: श्री अपार: +91-9818591240

4. जागृति माह: फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित आधारभूत विषयों पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से स्काइप या वेबिनार द्वारा, चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं। सम्मिलित होने हेतु ईमेल करें: requests@prashantadvait.com पर या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन:+91-9818585917

आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पाएंगे।
सप्रेम,
प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन

Like

प्रतिक्रिया

Advertisements

Report this ad

आगामी कार्यक्रम

चल बुल्लेया
बुल्ले शाह पर आध्यात्मिक प्रवचनमाला

प्रारंभ हो रहा है 8 जनवरी से (ऑनलाइन सत्र भी उपलब्ध हैं)

भाग लेने के लिए,
requests@prashantadvait.com पर ईमेल करें

या संपर्क करें:
+91-8376055661

फ्री-हार्ट्स शिविर

आचार्य जी के सानिध्य में रहने का सुनहरा मौका

तिथि: 17 – 19 फ़रवरी

स्थान: शिवपुरी, ऋषिकेश, उत्तराखंड

आवेदन भेजने हेतु: requests@anubodhfoundation.org पर ईमेल करें
या संपर्क करें: श्री अपार
+91-9818591240

चल बुल्लेया
बुल्ले शाह पर आध्यात्मिक प्रवचनमाला

प्रारंभ हो रहा है 8 जनवरी से (ऑनलाइन सत्र भी उपलब्ध हैं)

भाग लेने के लिए,
requests@prashantadvait.com पर ईमेल करें

या संपर्क करें:
+91-8376055661

40वां अद्वैत बोध शिविर

आचार्य जी के सानिध्य में रहने का सुनहरा मौका

तिथि: 26-29 जनवरी

स्थान: ऋषिकेश, उत्तराखंड

आवेदन भेजने हेतु: requests@prashantadvait.com पर ईमेल करें
या संपर्क करें: अंशु शर्मा
+91-8376055661

त्रियोग

तीन अलग-अलग तरह के योगों का एक अनूठा और दुर्लभ संगम जिससे जीवन में एक ऊर्जावान और स्वस्थ माहौल की स्थापना होती है।
आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर
या
संपर्क करें: श्री कुणाल: +91-9871561234

Advertisements

Report this ad

बुनियादी जीवन शिक्षा

अच्छे संबंध कैसे बनाऊँ ?मुझे हमेशा भविष्य की चिंता क्यों रहती है?जीवन में उत्साह कैसे लाऊँ ?जीवन से संताप और क्लेश कैसे दूर करूँ?सफल कैसे बनूँ?अपने क्रोध पर नियंत्रण कैसे पाऊँ?मैं हमेशा सोचता क्यों रहता हूँ?>> और (20) >>

जीवन सम्बन्धित लेख

आत्मविश्वासउपलब्धिउम्मीदईर्ष्याक्रोधख़ुशीचिंतानैतिकतामृत्युरचनात्मकतासरलता

No comments