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बाजी ले गए कुत्ते - पूरी प्रकृति में, आदमी अकेला है, जो भटक गया है - In all of nature, man is the only one who has gone astray.

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बाज़ी ले गये कुत्ते!

उद्गार मौन के


पूरी प्रकृति में, आदमी अकेला है, जो भटक गया है।

और सब जितने भी हैं, वह अपने घर में हैं। वो वहीं हैं, जहाँ उन्हें होना था। वो अपने घर से कभी बाहर निकले ही नहीं। चारों ओर देखोगे तो पाओगे कि हर तरफ एक निर्विकल्पता है। अगर सतही तौर पर देखो तो वह निर्विकल्पता बस इतनी-सी है कि आदमी के अलावा और कुछ भी सोचता-साचता नहीं है;कुछ पाने के लिए आतुर नहीं है;कुछ बन जाना नहीं चाहता। रेत हो, चाहे पेड़ हो और चाहे जानवर हो, उसे कुछ बन नहीं जाना है। सतही तौर पर निर्विकल्पता बस इतनी ही दिखाई देगी। क्या? कि कुत्ता पैदा होता है कुत्ता, और कुत्ता ही मर जाता है। कुछ और होने का विकल्प उसके पास होता ही नहीं है। मैं कह रहा हूँ, यह बात सिर्फ़ सत ही है। गलत नहीं है, सत ही है। बात असली यह है कि इस निर्विकल्पता के पीछे एक अचिन्त्य श्रद्धा है, एक ऐसी श्रद्धा जिसको सोचा नहीं गया, पर है। यह निर्विकल्पता यूँ ही नहीं आ गयी है, अनायास नहीं है, इत्तेफाकन नहीं है। कुत्ता यदि कुत्ता है और उसे और कुछ नहीं हो जाना, तो यह बात सांयोगिक नहीं है। लगती सांयोगिक है।

आपसे पुछा जाए कि कुत्ते की कुछ आकांक्षायें क्यों नहीं हैं; कुत्ता कुछ बन क्यों नहीं जाना चाहता;कुछ न कुछ अर्जित क्यों नहीं कर लेना चाहता? तो आप कहोगे कि कुत्ते के पास दिमाग ही नहीं है। क्योंकि उसके पास दिमाग नहीं है तो वह अपने कुत्ते होने से ही संतुष्ट है। उसको बस दो बार की रोटी मिलती रहे, उसका काम चलता रहता है| उसको और कुछ नहीं चाहिए। मैं कह रहा हूँ कि बात इससे कहीं आगे की है। दिखती इतनी सी है कि कुत्ते को कुछ चाहिए नहीं। सच तो यह है कि इसके पीछे एक गहरी से गहरी श्रद्धा है जो पूरी प्रकृति में फैली ही हुई है। जो बस आदमी को उपलब्ध नहीं है| बाकी हर जगह है। आम दृष्टि कहेगी कि कुत्ते के पास दिमाग नहीं है, इसलिए श्रद्धा है और मैं कह रहा हूँ कि कुत्ता हो, चाहे पेड़-पौधा हो, उनकी रग-रग में श्रद्धा ही बहती है। वह कोई सोची-विचारी श्रद्धा नहीं है|वह तर्क-विचार से आई हुई श्रद्धा नहीं है। वो बस है! एक सुकून है| जैसे कोई बच्चा अपनी माँ की गोद में हो। एक शांति है| जैसे कुछ छिन नहीं जाना है;कुछ पा नहीं लेना है। एक स्थिरता है, स्थायित्व है। जैसे तुम अपने ही घर में हो। और यह प्रकृति में सबको उपलब्ध है, इंसान के अलावा। अगर तुम किसी जानवर को तकलीफ दे दो अलग बात है, वरना तुम उसकी आँखों में झाँककर देखो, तुम्हें शान्ति दिखाई देगी। तुम चिड़ियों की चहचाहट सुनो, इसमें तुम्हें एक सुकून सुनाई देगा। यह सुकून अनायास नहीं आ सकता। अगर विज्ञान हमें यह बताये, अगर प्राणीशास्त्री हमें यह बताये कि ये तो बस इनके संस्कार हैं, ये हैं ही ऐसे|इनकी कंडीशनिंग ऐसी है, तो वह पागल है;बात को समझ नहीं रहा है। सच तो यह है कि चिड़िया, कुत्ते, पेड़ और नदियाँ, और रेत कोई ऐसा राज़ जानते हैं जो इंसान को नहीं पता। और इसी कारण उन्हें शांति उपलब्ध है, सुकून उपलब्ध है।हमाराबड़ा मूर्खतापूर्ण अहंकार है कि हम सोचते हैं कि हम उनसे ऊपर हैं। जो ध्यान से देखेगा वो कहेगा कि असल राज़ तो उनपर ही खुला हुआ है। असली बात तो उन्हें ही पता है। तो ऊपर है भी तो कौन है: हम कि वो?

तुम जानवरों को यदि कृत्रिम परिस्थितयों में न रखो तो नहीं पाओगे कि वो गहरे तनाव में हैं। कम से कम लम्बे समय तक तनाव में नहीं हो सकते,डिप्रेशन में नहीं चले जाते, आत्महत्या नहीं करते, बलात्कार नहीं करते। एक सहज शान्ति उपलब्ध है उनको, जो इंसान को बिलकुल नहीं है। निश्चित रूप से कुछ ऐसा है पूरी कायनात में जिससे इंसान दूर हो गया है|बाकी सबको मिला हुआ है। उसी को मैं कह रहा हूँ कि वो निर्विकल्प श्रद्धा है, जो उपलब्ध है, कुत्ते को। जैसे कि बहुत पहले उसने तय ही कर लिया हो कि ‘सब ठीक है, और आगे मैं कभी कुछ सोचूँगा ही नहीं’। और चूँकि उसने अब तय ही कर लिया है कि आगे मुझे कुछ सोचना ही नहीं है, क्योंकि सब ठीक है, मैं अपने घर में हूँ, मैं पिता की गोद में हूँ, तो सोचता नहीं है इस कारण, और उसके न सोचने को हम उसकी हीनता समझ लेते हैं। हम सोचते हैं कि उसमें कोई खोट है, जो उसे सोचना नहीं आता। सही बात तो यह है कि उसे समाधान मिल गया है, वह क्यों सोचे? सोचना तो समस्या का प्रतीक है। यदि आपको सोचना पड़ रहा है बार-बार, तो इसका मतलब है कि आप समस्याग्रस्त हो, कोई उलझन है आपके सामने। यदि कोई उलझन हो ही ना तो कोई सोचेगा क्यों? विज्ञान आपसे बोलेगा कि वह इसलिए नहीं सोचता क्योंकि उसके पास दिमाग नहीं है। मैं कह रहा हूँ कि वह इसलिए नहीं सोचता क्योंकि उसके पास कोई समस्या ही नहीं है|करेगा क्या सोचकर? पर यह इंसान का बड़ा फितूर है कि उसने सोच लिया है कि सोचना बड़ी बात है। सोच लिया है कि सोचना बड़ी बात है। और उसने सोच लिया है कि जो जितना सोचे वह उतना बड़ा। तो जो सोच ना पाए वह बेवक़ूफ़। और यह क्या है? यह तुम्हारी सिर्फ सोच है। इस सोच पर हम पूरी दुनिया को तोले जा रहे हैं। अपने ही द्वारा बनायी गयी इस सोच पर हमने सबको नाप लिया है और अपने आपको सबसे ऊंचा रखा है। मज़ेदार बात है! हम ही ने तय किया है कि पैमाना क्या होगा और हम ही घोषणा किये फिरते हैं कि हम सर्वश्रेष्ठ हैं। क्यों? क्योंकि हम सोचते हैं। क्यों? क्योंकि हम कुछ और हो सकते हैं, हम अपने स्वभाव से दूर जा सकते हैं, हम बदल सकते हैं।

बेवकूफ मत समझ लेना जानवर को। उसकी बड़ी गहरी समझदारी है। अस्तित्व में कुछ भी बेवक़ूफ़ नहीं है, सब सबकुछ समझता है। वह जो राज़ है वह सब पर खुला है, वह राज़ है ही नहीं। कुछ भी बेवक़ूफ़ नहीं है। अगर तुम किसी पशु-पक्षी को एक प्रकार का व्यवहार करते देखते हो और वह तुमको समझ नहीं आता, वह तुमको मूर्खतापूर्ण लगता है तो वह ‘तुम्हें’ मूर्खतापूर्ण लगता है, भूलना नहीं इस बात को।

किसे मूर्खतापूर्ण लगता है? ‘तुम्हें’!

तुम्हारे लगने भर से वह मूर्खतापूर्ण हो नहीं गया। उसके पीछे कारण है|वह जो भी कर रहा है, उसके पीछे कारण है। बड़े गहरे कारण हैं। हमारी सोच में समाएँगे नहीं, इतने गहरे कारण हैं। स्वयं विराट ही वह कारण है। ये पक्षी ऐसे ही नहीं गाते|जो आवाज़ आ रही है चिड़िया की, फ़ालतू ही नहीं है। वह कुछ अभिव्यक्त कर रही है। कुछ विशेष नहीं, भाषा नहीं है उसके पास। या यह कह लो कि नियम कायदों में बंधी हुई भाषा नहीं है उसके पास। पर वह जो बता रही है वह समूचे अस्तित्व की कहानी है। तुमको सुनना नहीं आता, यह अलग बात है। कहानी तो कही जा रही है, हमें सुननी नहीं आती। उसको बेज़ुबान मत कह देना। उसको बेदिमाग मत कह देना। किसी भी अर्थ में उसको हीन मत समझ लेना। उसे सब पता है। और उसको इतनी गहरे से पता है कि उसे उस बारे में विचार नहीं करना पड़ता। यहाँ तक कि तुम उस से पूछोगे कि तुझे क्या पता है, वह बता भी नहीं पाएगी कि क्या पता है। क्योंकि उसको जो पता है, वह अब उसकी मांस-मज्जा बन गया है। वह उसके रेशे-रेशे में समा गया है। इतनी गहरे से पता है कि अभिव्यक्ति अब संभव ही नहीं रही। तुम्हें भी जब वास्तव में कुछ पता चल जायेगा तब अभिव्यक्ति संभव ही नहीं रहेगी। चूँकि तुम्हें पता नहीं होता है, तुम बोल पाते हो कि मुझे पता है। याद रखना तुम अभिव्यक्त उसको ही कर पाओगे जो आधा अधूरा पता हो। जब पूरा पता चल जाएगा तो तुम भूल जाओगे कि तुम्हे पता है। जब पूरा जान जाओगे तो बिलकुल स्मरण नहीं आयेगा कि जानते हो। पूरी प्रकृति इसी स्थिति में है। वह इतनी ज्यादा जानती है, और इतनी गहराई से जानती है, और इतनी करीबी से जानती है कि उसको अब स्मरण भी नहीं है, उसको अब विचार भी नहीं है कि हम जानते हैं। तुम पूछोगे यदि, सामने छोटा-सा पौधा है, कि तुम क्या जानते हो? वह तुम्हें कुछ बता नहीं पायेगा। शब्दों में नहीं बता पायेगा। हाँ, उसका होना ही पूरी कहानी कह रहा है कि उसको क्या पता है। वह संतुष्ट है, वह समाधिस्त है, वह लीन है। उसके होने को पढ़ सको तो बिलकुल जान जाओगे कि उसको क्या पता है। उससे भाषा में पूछोगे कि तुझे क्या पता है तो वह नहीं बता पायेगा। उसके होने को पढ़ लिया तो सब स्पष्ट है।

सरल आदमी, सहज आदमी, होने को पढ़ता है। वह अनकहे को सुनता है। बुल्ले शाह वैसे ही लोगों में से हैं। वो प्रकृति के होने को देख रहे हैं और पा रहे हैं कि वहाँ पर एक गहरी तल्लीनता है, जिसको श्रद्धा कहना ही उचित होगा। उसे और कुछ कहा भी नहीं जा सकता। देखो किन शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं बुल्ले शाह, कुत्ते की ही बात कहने के लिए:

खसम अपणे दा दर ना छड्दे

भावें वज्जण जुत्ते

तैकूं उत्ते|

अपने खसम का दरवाज़ा छोड़कर वह कहीं नहीं जाते। खसम को यह मत समझ लेना, जो कुत्ते का मालिक होता है। कुत्ते का तो एक ही मालिक है, कौन? ‘वही’! तुम बेकार ही अपने को कुत्ते का मालिक बोले रहते हो। मेरा कुत्ता! मेरा कुत्ता! तुम दो रोटी डाल देते हो, इससे तुम मालिक नहीं हो गए कुत्ते के। शोषण कर सकते हो उसका। पर मालिक तो एक ही है। पूरी प्रकृति का मालिक तो एक ही है। वही परमपुरुष जो है।

खसम अपने दा दर ना छड्दे – कुत्ता शिकायत नहीं करेगा। उसको चोट भी लग जाएगी, उसे दर्द हो सकता है पर शिकायत का भाव उसमें नहीं उठेगा। जब तक पीड़ा हो रही है, वह उस शारीरिक कष्ट से तड़पेगा, पर बस इतना ही। उसको वह अपनी मानसिक बीमारी नहीं बना लेगा। कुत्ते की भक्ति इतनी गहरी है कि तुम कुछ भी कर लो उसके साथ, वह यह नहीं कहेगा कि धोखा हुआ| वह यह नहीं कहेगा कि मैं क्यों कुत्ता बनकर पैदा हुआ। वह यही कह रहे हैं, भावें वज्जन जुत्ते – तुम्हीं जूते ना मारो, कुछ गिने-चुने ही कष्ट हो सकते हैं जो उसे मिल सकते हैं। निराशा नहीं उठेगी उसके मन में। अहंकार नहीं है ना। आज नहीं मिला, भूखा रह लेगा, कल मिल गया तो यह नहीं कहेगा कि बीते कल क्यों नहीं दिया था? आज क्यों लेकर आ गये| आज मिलेगा, नया दिन है और खा भी लेगा। और जब कुत्ता ऐसा करता है तो हम कहते हैं, छी, जानवर! इसके भीतर कोई आत्म सम्मान नहीं है क्या? फेंकी रोटी भी खा लेता है। तुम फ़ेंक के देते हो, खा लेता है।

तुम कहते हो, जानवर है ना। और कुत्ता क्या कह रहा है? रोटी कौन सी तुम्हारी है जो तुम फ़ेंक कर दे रहे हो? जिसकी रोटी है वो मुझे फ़ेंक कर दे या जैसे भी दे मुझे स्वीकार है। क्योंकि वह मेरा है, मुझे प्यार है उससे। तुम्हारी रोटी कहाँ है? तुम तो माध्यम हो। तुम्हारे हाथों से आ गयी तो अलग बात है। यह कुत्ते की समझ है।

तुम क्या सोच रहे हो? तुम सोच रहे हो, मैं मालिक, मैंने कुत्ते को रोटी फ़ेंक कर दी। और यह तो मक्कार जानवर है। ज़मीन पर पड़ा है, उठाके खा लेता है।

कुत्ता कह रहा है, तुम बात समझे ही नहीं। सबको फेंकी हुई ही मिलती है। अर्जित किसने करी है?

कुत्ता तुमसे कह रहा है, इंसान तू क्या सोच रहा है? तुझे जो रोटी मिलती है वो तेरी योग्यता से मिलती है? मिलती तो तुझे भी फेंकी हुई ही है पर तू स्वीकार नहीं करेगा क्योंकि तू घमंडी है। अहंकार गहरा है तेरा। मिलती तो तुझे भी फेंकी हुई ही है। फेंकी के अलावा किसी को कुछ और मिल ही नहीं सकता, तो मुझे क्यों अड़चन हो, फेंकी रोटी खाने में?

वो ज़मीन पर पड़ी हुई सब्जी खा लेगा| तुम कहोगे, यह देखो, इसको ज़रा भी ख्याल नहीं कि गन्दा है। मिटटी पर पड़ा हुआ खा गया।

और कुत्ता क्या कह रहा है? मिटटी के अलावा और किसी ने आजतक खाया क्या है? तुम पगले हो कि तुम्हें लगता है कि तुम सोना-चाँदी खा रहे हो। मैं अच्छे से जानता हूँ कि जिसने खाया है, उसने आजतक मिटटी ही खाई है। तुम अपने गुरूर में बैठे रहो कि मैं पकवान खा रहा हूँ। मैं अच्छे से जानता हूँ कि तुम मिटटी ही खा रहे हो| तो मैंने खा ही ली थोड़ी मिटटी तो क्या दिक्कत हो गयी?

कुत्ता यह सब विचार नहीं रहा है। तुम कुत्ते के दिमाग का अगर अध्ययन करोगे तो तुम्हें यह सब मिलेगा नहीं। पर इसका मतलब यह मत समझ लेना कि वह यह सब जानता नहीं। वह अच्छे-से जानता है। जानता ना होता तो ऐसे नहीं जी सकता था, जैसे वह जी रहा है। संत उसके शब्दों को नहीं, उसके होने को पढता है। बुल्ले शाह देख रहे हैं, यह पूरी प्रकृति चलती कैसे है, वह है क्या? और देखने भर से समझ जा रहे हैं, कह रहे हैं ना, यह बात सांयोगिक नहीं हैं। तुम देखो ध्यान से, तुम सड़क पर जा रहे हो। तुम अपनेआप को इंसान कहते हो, ताकत है|तुम कहते हो तुम्हारे पास दिमाग है और एक छोटा-सा कुत्ता है। और तुम्हारा दावा है कि उसके पास कुछ नहीं है। और वह मरियल सा है। तुम देखते हो कि तुम्हारे पीछे आ गया हैऔर पूँछ भी हिला रहा है। और तुम ज्यों ही पीछे मुडके देखते हो तुम्हारा क्या होता है? तुम डर जाते हो। और कुत्ता क्या कर रहा है? वह मज़े ले रहा है। वह पूँछ हिला रहा है, तुम्हारे पीछे-पीछे आ रहा है। यह जो इंसान है जो अपने आपको ताकतवर बोलता है, वह उस छोटे-से कुत्ते से डर गया। जबकि उस कुत्ते ने कुछ ऐसा किया नहीं है। और जो कुत्ता है जिसको तुम कहते हो कि पागल है, बेवकूफ है, वह मज़े में तुम्हारे साथ लगा हुआ है, उसे डर बिलकुल नहीं लग रहा। डर उसे ही नहीं लगता जो ताकतवर होता है। तो ताकतवर कौन हुआ? तुम या वो छोटा-सा कुत्ता? ध्यान दो। दो लोगों का आमना-सामना हो रहा है, तुम्हारा और उस कुत्ते का। दिखने में ऐसा लगता है कि ताकत तुम्हारे पास है। पर अगर ताकत तुम्हारे पास होती तो तुम डर क्यों जाते? वो मरियल है तब भी मज़े में है। और पूँछ हिला रहा है|हालाँकि वह तुम्हें बिलकुल नहीं जानता। और सही बात तो यह है कि इंसान कुत्ते से कहीं ज्यादा कटैला होता है। कुत्ता तुम्हारे पीछे लगे तो आमतौर पर नुक्सान किसका होना है? कुत्ते का ही होना है। क्योंकि इसकी सम्भावना कम ही है कि वह तुम्हें काट लेगा, इसकी सम्भावना कहीं ज्यादा है कि तुम उसे ज़ोर से पत्थर मार दोगे। और ऐसा होता है कि नहीं होता है? कुत्ता चाहे काट रहा हो या नहीं, हम पत्थर मारने को हमेशा तैयार हैं। और कुत्ते ने देखा भी है। उसने पत्थर खाये भी हैं। और फिर भी वह तुम्हारे साथ-साथ लग लिया है, और पूँछ हिलाये जा रहा है। और ऐसा नहीं है कि तुम्हारे पास उसे देने के लिए कुछ है;ऐसा नहीं कि तुम कुछ खाने-पीने का सामान लेकर चल रहे हो। वो फिर भी यूँही तुम्हारे साथ लगा हुआ हैऔर तुम डरे हुये हो। ताकतवर कौन है? कुत्ता! और उसके पास क्या ताकत है? नहीं, वो सोच नहीं सकता। उसके पास उस ही श्रद्धा की ताकत है, जिसको बुल्ले शाह कह रहे हैं, ‘खसम अपने दा दर ना छड्दे’ – उसने जो ताकत पाई है वो उसकी नहीं है, वह उसके ख़सम की है, उसके पिता की है, उसके स्वामी की है। तुम मालिक से दूर हो, वह नहीं दूर है। उसके पास वो ताकत है। उस मरियल-सी जान में कुछ नहीं है। पर फिर भी उसके पास बहुत कुछ है। क्योंकि उसके पास ‘उसकी’ ताकत उपलब्ध है। वह उसको छोड़कर कभी दूर हुआ ही नहीं। तुम दूर हो गये।

तुम कहते हो कि मेरी ताकत इसमें है कि मैं जब चाहूँ इस पेड़ को काट सकता हूँ। तुम्हें कैसे पता है कि पेड़ कटने को भी राज़ी नहीं है? तुम कहते हो कि मैं बड़ा काम कर रहा हूँ कि मैंने उसे काट दिया। तुम्हें कैसे पता कि वह खुद ही नहीं कह रहा है कि ठीक; अब वक्त आ गया है तो कट भी लेंगे। जैसी उसकी इच्छा, जैसी उसकी मर्ज़ी। मैं फिर कह रहा हूँ;वह इस बात का विचार नहीं करेगा। वह इस बात को कभी शब्दों में अभिव्यक्त नहीं करेगा कि ठीक; परमात्मा, आज आखिरी दिन है|कुल्हाड़ी लेकर आ रहा है सामने से|अलविदा! वह यह नहीं कहेगा;शब्दों में नहीं कहेगा। पर बात है ऐसी ही। बात बिलकुल ऐसी ही है। और अगर तुम, संतों के करीब जा सको, थोड़ा भी बुल्ले शाह जैसे हो सको तो जानवरों की आँखें, पेडों का हिलना, यह सब पढ़ पाओगे।

बुल्लेशाह कोई वस्त विहाज लै,

नहीं ते बाज़ी लै गये कुत्ते,

तैकूं उत्ते।

बाज़ी ले ही गये हैं कुत्ते। यह मत समझ लेना कि बुल्ले शाह व्यंग कर रहे हैं। बुल्ले शाह यह नहीं कह रहे हैं कि कुछ कर लो वरना कुत्ते भी तुमसे बेहतर हो जायेंगे। बुल्ले शाह कह रहे हैं कि कुत्ते तुमसे बेहतर हैं ही। बाज़ी ले ही गये हैं। तुम कितनी भी कोशिश कर लो, बाज़ी जीत नहीं सकते। हद से हद यह कर सकते हो कि उनकी बराबरी पर आ जाओ। वह ऊँचे से ऊँचा मुकाम है जो तुम्हें मिल सकता है। तुम उनसे बेहतर कभी नहीं हो पाओगे। जो पहले ही पहुँचा हुआ है;जो पहले ही अपने घर में है, उससे आगे कहाँ निकलोगे? वह है ही जहाँ उसे होना था। उससे बाज़ी अब तुम जीतोगे कैसे? हाँ, तुम वैसे ही हो सकते हो। उस से बढ़कर कुछ नहीं हो सकते। यह बढ़ना ही तुम्हारी बीमारी है। बुल्ले शाह कह रहे हैं कि वह जो परम वस्तु है, उसे पा लो। वो कौन-सी परम वस्तु है? वह वही चीज़ है, जो सबको ही मिली हुई है। जो सबके रेशे-रेशे में समाई है। जो हर इंसान का, हर चीज़ का मूल तत्व है। तुम्हारा भी है! पेड़, पौधों और पशुओं का ही नहीं है, तुम्हारा भी है। पर तुम उसे भूले बैठे हो। और भूले क्यों बैठे हो, क्योंकि स्मरण का तुम एक ही तरीका जानते हो, विचार! जब कहूँगा मैं कि भूले बैठे हो, तो तुम क्या कोशिश करते हो? कि याद करूँ। और यह याद करना क्या है? कि सोचूं।

तुम स्मरण करने का मात्र एक ही तरीका जानते हो, मात्र स्मृति।

स्मरण का जो एक और तरीका होता है, जो एकमात्र वास्तविक तरीका होता है, वह हम जानते नहीं। वह कौन सा तरीका है? वह है ध्यान का। वह होता है भक्ति का, बोध का! उसमें पता नहीं कहाँ से सब याद आ जाता है। वो ना देखा, ना सुना, ना पढ़ा; बस सब याद आ जाता है। और तुम कहोगे, यह कहाँ से पता चल गया? आज से पहले तो किसी ने बताया भी नहीं था मुझे, फिर कहाँ से पता चल गया? यह होता है उस शून्य अवस्था में, जिसमें ध्यान से पहुँचा जा सकता है, जिसमें भक्ति से भी पहुँचा जा सकता है। अचानक सारे राज़ खुल जाते हैं। और तुमने किसी से सुना नहीं है|इन्द्रियों से कोई अनुभूति नहीं हुई है। पर सब पता चल गया है, और ऐसा पता चला है कि तुम्हें उसमें पूरा-पूरा विश्वास है। अब कोई तुमसे कहे कि, ‘ना-ना, यह तुम्हें बस लग रहा है| ऐसा है नहीं’। तो तुम मानोगे नहीं। तुम कहोगे, ‘ना, पक्का पता चल गया है। कैसे पता चल गया है, यह मत पूछना, बस पता चल गया है। नदी ने बता दिया, चुप-चाप बैठे थे, बस यूँही जान गये। आसमान से उतरी कोई बात और हमें पता चल गयी, कहाँ से आई यह मत पूछो। कैसे पता चला, बताने का कोई तरीका नहीं। लेकिन जान गये हैं। वह पूछे, ‘अच्छा इतना तो बता दो कि क्या जान गये हो? तुम यह भी नहीं बता पाओगे कि क्या जान गए हो। बस इतना कह पाओगे, कि ‘बड़ा सुकून है|यह भाव ही नहीं है कि मैं अज्ञानी हूँ, नहीं जानता। पर जान ही गया होऊँगा। जैसे कभी सो कर के उठोऔर घड़ी पास ना हो तो तुम्हें पता ना चले कि कितने घंटे सोये। लेकिन बड़ा ताज़ा अनुभव कर रहे हो|कोई पूछे कितना सोये? बता नहीं पा रहे। पर कहोगे कि जितना भी सोया होऊँगा, काफी ही होगा। क्योंकि हल्का है मन, शांत हूँ, ताज़ा हूँ। ऐसे ही ‘वह’ उपलब्ध हो जाता है।

देखो, भारत ने इस बात को हमेशा से जाना है। मैं श्रीमद्भागवत गीता का ग्यारहवाँ अध्याय देख रहा था। उसमें बड़ी मज़ेदार बात थी। बुल्ले शाह ने याद दिला दी उसकी। वह कहता है वहाँ पर कि, ऐसे हो जाओ कि सारे शास्त्रों को पढ़ने के बाद भी पशु जैसे रहो;तब तो तुमने कुछ पाया। ऐसे हो जाओ कि सारा ज्ञान अर्जित करने के बाद भी तुम्हारी दशा पागल जैसी रहे; तब तो तुमने कुछ पाया। और जिसने भी जाना है, उसने यही कहा है कि ऐसे हो जाओ कि सब समझ में आ गया, सब जान लिया, सब समझ लिया और यह सब जानने, पढ़ने का नतीजा क्या हुआ? मैं बिलकुल पशुवत हो गया। तब तो तुमने कुछ पाया। और वही बात बुल्ले शाह कह रहे हैं। ज्ञान तुमको संस्कार ना दे दे। मैं दुआ करता हूँ तुम सबके लिए कि ज्ञान तुम्हें ‘कुत्ता’ बना दे। तब तो कुछ मिला है। कुत्ते की तरह हो जाओ|जिसको कह रहे हैं बुल्ले शाह कि इधर भौंकते, उधर भौंकते और उधर जाकर कूड़े के ढेर में पड़ जाते हैं। ऐसे ही हो जाओ। जाकर कूड़े के ढेर में पड़ जाओ। ऐसे नहीं कि कहा गया कि बाहर आकर लेटो रेत पर तो घबरा जाओ। ‘अरे हम संस्कारी लड़कियाँ हैं।

(सभी हँसते हैं)

कुत्ते जैसे ही हो जाओ। पड़ जाओ कूड़े पर। और कूड़ा, कूड़ा लगे ही ना। देखो कूड़े को और कहो, पिता जी ने भेजा है। इससे बेहतर बिछावन नहीं हो सकता। उन्होंने ही भेजा है। अभिप्राय बस सारे आदमियों में होते हैं। कुत्ता रेत में वैसे ही बैठेगा जैसे तुम्हारे घर के कीमती सोफे पर। तुम्हें अंतर नहीं दिखाई देगा। तुम उसे बैठा लो किसी महंगी चादर परऔर उसके चहरे को देखो; तुम अंतर पाओगे ही नहीं। हाँ, आदमी का चेहरा बदल जायेगा।

संस्कारों के दो तल होते हैं। एक तल होता है सामाजिक, तो पहला काम तो यही होता है कि जो समाज से पा लिया, उससे मुक्त हो जाओ। जो समाज ने तुम्हारे ऊपर डाल दिया है, उससे मुक्त हो जाओ। यही कारण है कि बुद्ध को समाज छोड़कर प्रकृति के पास जाना पड़ता है। कुत्ता उसी प्रकृति का प्रतीक है। कुत्ता हो जाने का अर्थ ही यही है कि समाज से मुक्त हो गये। कुत्ता ठीक वही बोद्धिवृक्ष है, जिसके नीचे बुद्ध बैठे थे। एक ही बात, दोनों प्रकृति हैं। समाज से मुक्त हो गये। यदि गीता हमसे कहती है कि पशुवत हो जाओ, तो उसका अर्थ यही है कि अब तुम्हारे ऊपर समाज का कब्ज़ा नहीं रहा। हांलाकि, पशुवत हो जाना भी आखिरी बात नहीं है। लेकिन जो पशुवत हो गया, वह शीघ्र ही अपने प्राकृतिक संस्कारों से भी मुक्त हो जाता है। सामाजिकता से तो वह मुक्त हो ही गया है;फिर वह प्रकृति से भी मुक्त हो जाता है। इसलिए कहा जाता है कि पशुवत हो जाओ, जानवर जैसे हो जाओ। तुम हो;इस पर पहली परत चढ़ती है प्रकृति की। प्रकृति तुम्हें पौधा बनाती है, पत्थर बनाती है, पेड़ बनाती है या इंसान बनाती है। वह तुम पर पहली तह चढ़ाती है और दूसरी कौन चढ़ाता है? समाज! कुत्ता उस दूसरी तह से पूरी तरह मुक्त है। इंसान जब दूसरी से मुक्त होकर पहले में आता है, तो मैं कह रहा हूँ, वह जल्दी ही पहले से भी मुक्त हो जाता है। जो दूसरी परत है, वह है, जो पहचानें जो तुमने पचास बना रखीं हैं। जब उन पचास पहचानों से मुक्त हो जाते हो तो प्रकृति के तल पर तुम्हारे पास सिर्फ एक पहचान बचती है, शरीर। क्योंकि प्रकृति से शरीर के अलावा कुछ नहीं मिला है। मन तो पूरा समाज का दिया हुआ है। प्रकृति ने शरीर दिया है। जब समाज से मुक्त हो जाते हो तो सिर्फ एक पहचान बचती है, शरीर! फिर वह उस एक पहचान से भी बंधे नहीं रहोगे, वह पहचान भी बहुत दिनों की नहीं होती। उसकी पकड़ भी हल्की होती जाती है। पूरी तरह मुक्त हो जाते हो।

जो कुछ है, जहाँ है, देखो खुश है। इतना खुश है कि उसे अपनी ख़ुशी व्यक्त भी नहीं करनी पड़ रही। तुम किसी स्वस्थ पौधे को देखो, उसे हँसना नहीं पड़ेगा; क्यों? क्योंकि उसका स्वास्थ्य ही उसकी ख़ुशी है। तुम नदी को देखो;वह कहेगी नहीं कि बड़ी प्रसन्ता मिली|उसका बहना ही उसकी ख़ुशी है। तुम चिड़िया को देखो;वह चिल्लायेगी नहीं कि खुश हूँ|उसका फुदकना ही उसकी ख़ुशी है। इंसान अकेला है, जिसको ख़ुशी के लिए कुछ करना पड़ता है। कि ख़ुशी चाहिए तो यह करके दिखाओ। प्रकृति में बाकी जो कुछ है, खुश ही खुश है। होने में ही खुश है। हूँ, तो खुश हूँ! निरंतर खुश हूँ। ख़ुशी में कोई बाधा पड़ ही नहीं रही है। कुछ पाना नहीं है कि खुश हो जायेंगे तब। यह सब मस्त हैं, मगन हैं! बस हमारे मन में अगन है। हमें आग लगी हुई है। कुछ करके दिखाना है। क्रांतियाँ उठा देनी है। पता नहीं क्या कर जाना है।

ये आसमान, ये बादल,ये रास्ते,ये हवा

हर एक चीज़ है, अपनी जगह ठिकाने पर।

कई दिनों से शिकायत नहीं ज़माने से|

सब कुछ अपने ठिकाने पर है, पर हमारा दिमाग ठिकाने पर नहीं है।

श्रोता १: अब कोई कुत्ता कहेगा तो बुरा नहीं लगेगा।

वक्ता: अरे, तुम्हारा इससे बड़ा सम्मान नहीं हो सकता।

श्रोता २: अगर प्रकृति ने सब कुछ ऐसा बनाया कि सब अपनी जगह खुश हैं, तो इंसान को ऐसा क्यों नहीं बनाया?

वक्ता: उस ही से पूछो। इस राज़ से पर्दा वही हटा सकता है|मुझे तो नहीं पता। पिछली बार हम घूमने गए थे तो एक कुत्ता आकर बैठ गया|तो एक फोटो खिंच गयी। अभिषेक उसे फ्रेम करके ले आया। हुआ कि इसे अब टाइटल देना है। बहुत सारे टाइटल आये। अचानक सूझा कि इसका इससे ज्यादा सही टाइटल हो ही नहीं सकता कि लिख दो, “डॉग्स”। उसमें मेरी शक्ल थी और कुत्ते की थी। तो फिर उसके नीचे लिखा गया, “डॉग्स”। इससे बड़ी इज्ज़त कौन सी बक्शी जायेगी? हाँ, कुत्ता उसपर थोड़ी आपत्ति कर सकता है। कहेगा, ‘अभी जब तुम कुत्ते हुये नहीं;कपड़े तुम पहनते हो, अहंकार तुममें है, तो तुम्हें हक क्या है अपनेआप को कुत्ता बोलने का? पर कृपा है उसकी कि कोई कुत्ता आकर के शिकायत नहीं करेगा। तुम जाओ किसी कुत्ते के सामने और कहो मैं कुत्ता हूँ तो वो कहेगा, ‘ठीक है, मर्ज़ी है’।

यह सब जाना जा रहा है, समझा जा रहा है|उसका प्रयोजन बस यही भर है;बस समझ लेना। तुम यहाँ इसलिए नहीं आये हो कि कुछ और भरकर ले जाओगे। तुम अपनी नग्नता हासिल करने आये हो। हासिल कहना भी ठीक नहीं|तुम अपनी नग्नता को पुनः प्राप्त करने आये हो। वह मिली ही हुई थी, तुमने उसे खो दिया। तो उसे दुबारा हासिल करने आये हो। कुछ और ओढ़के नहीं वापस जाना है। नंगे होकर लौटना है। कुत्ता होकर लौटना है। कुत्ते की गरिमा को देखो|तुम उसे आदमी बोलते हो, वह उसे भी सह लेता है। तुम उसे नाम दे देते हो;वो कहता है कि कोई बात नहीं। नाम भी इंसानों वाले देते हो।

श्रोता ३: तो फिर यह कहना तो गलत होगा कि जानवरों के अन्दर समझ नहीं?

वक्ता: जानवरों की समझ इतनी गहरी है कि वह एक निर्विचार समझ है। उन्हें सोचना नहीं पड़ रहा है, सोचने के लिए। वह समझे ही हुये हैं। तुमको समझने की ज़रुरत होती है| तुम इसलिए समझने की कोशिश करते हो। वह समझे ही बैठे हैं। समझने को क्या है? हम जी रहे हैं। समझने को क्या है? जीना काफी नहीं है क्या? होना काफी नहीं है क्या? अब समझना क्या है? बोध में हम स्थित ही हैं|अब और क्या जानें? क्या है जो इस पौधे को समझना चाहिये? तुम्हें समझना है कि क्लोरोफिल क्या होता है; वह क्यों समझे? उसे नहीं जानना। तुम्हें लाख तरीके की बीमारियाँ होती हैं। तुम अपनी खुजली मिटाने के लिए इधर शोध कर रहे हो, उधर शोध कर रहे हो|तुम्हें जानना है कि पत्थर में क्या है|तुम्हें जानना है कि पहाड़ में क्या है। तुम्हें जानना है कि मंगल ग्रह पर क्या है। वो पौधा कह रहा है;जहाँ भी है और जो भी है उसका निचोड़ मैं हूँ|अब जानना क्या है? पूरा अस्तित्व मेरे रूप में प्रकट हो रहा है| अब मुझे जानना क्या है? मंगल ग्रह पर, तमाम तारों पर और तमाम सूरजों पर जो कुछ भी है, उसका एक-एक तत्व मुझमें समाया हुआ है। अब जानना क्या है? तुम्हें जानना है। तुम्हें नाम देने हैं ना, जान-जान कर। कि इसके भीतर यह केमिकल होता हैऔर फिर यह गैस लेता है, आदि-आदि। और इसको तुम कहते हो कि यह मेरा ज्ञान है। इसी बात पर मानवता फूली नहीं समाती कि हम बड़े ज्ञानी हैं। उसको पता है।

श्रोता ४: सर इसका मतलब तो यह हुआ कि मनुष्य अपने साथ भी खिलवाड़ करता है और दूसरों के साथ भी।

वक्ता: बिलकुल करता है। जैसी यह पूरी दुनिया है, उससे अगर ज़रा भी अलग होती तो यह पौधा नहीं हो सकता था। पूरी दुनिया जब इकट्ठी हुई है, तब यह पौधा निकला है। सूरज ना होता तो यह पौधा हो सकता था? पूरी दुनिया में यदि कुछ भी कम या ज्यादा होता तो यह पौधा नहीं हो सकता था। इसका अर्थ क्या है? कि पूरी दुनिया ही है, जो पौधे के रूप में दृश्यमान हो रही है, प्रकट हो रही है। अपनेआप में पूरी दुनिया को समाये हुये हैं। अब उसे जानना क्या है? अब क्या बचा जानने को? जो कुछ जानने लायक था, वह तो मैं हूँ। अब क्या जानना है? शेष क्या रह गया? ज्ञान अर्जित करने की बीमारी हमें है|सूचनाओं को संग्रह करने की बीमारी हमें है|ना जीने की बीमारी हमें है। दिमाग में बैठे रहने कि बीमारी हमें है। किसी पौधे को जब देखो, तो पौधे की तरह मत देखो|नाम मत दे दो कि पौधा है। समष्टि प्रकट हो रही है। जो कम्पलीट है, वह इस पौधे के रूप में तुम्हारे सामने है|उसे झुककर के प्रणाम करना सीखो। एक नन्हा-सा घास का तिनका भी है ना, वह अपनेआप में पूरी कायनात को समेटे हुये है|उसे नन्हा मत समझ लेना। इससे बड़ी भूल नहीं हो सकती कि तुम जानवरों को हीन समझो। इससे बड़ी मूर्खता नहीं हो सकती। और यह बात बिलकुल मन से निकाल दो कि मनुष्य सर्वश्रेष्ठ है। ऐसा कुछ भी नहीं है, बिलकुल ऐसा कुछ नहीं है। यह बातें तुम्हीं ने कह दी हैं कि “मैन इज़ गॉड्स बेस्ट क्रिएशन”|गॉड नहीं कहने आया था। वह सारी किताबें तुम्हारी ही हैं, जिसमें तुम दावा कर रहे हो कि हम सर्वश्रेष्ठ हैं। अब जब ‘तुम’ कहोगे तो तुम तो यही कहोगे। और कोई जानवर कभी कुछ कहने आयेगा नहीं। वह कहेगा, इसकी भी हम परवाह क्यों करें कि बतायें कि सर्वश्रेष्ठ कौन है।

श्रोता ५: उसे फर्क ही नहीं पड़ता।

वक्ता: उसे फर्क ही नहीं पड़ता। वह कहता है, ठीक है। तुम्हें झुनझुना बजाना है, तुम बजाओ। तुम्हें मानना है कि तुम सबसे ऊँचे हो तो मानते रहो। अब देखो रेत को, हर चीज़ को; देखो सब कुछ अपनी-अपनी जगह पर कैसे,बिलकुल ठीक हैं और कैसे सब शांत हैं। पिता की गोद में हैं। जैसे वही है एक, जो सबके रूप में प्रकट हो रहा है। जैसे, किसी को कोई उलझन ही नहीं है। हवा चलती है, पत्ते हिल लेते हैं। हवा चलनी बंद हो जाती है, पत्ते शांत हो जाते हैं। किसी को कोई उलझन ही नहीं है। पड़ी है रेत, तुम दबा देते हो, दब जाती है|नहीं दबाओगे, नहीं दबेगी। कोई दिक्कत नहीं। ठीक!

निर्द्वंद्वता! निर्वैरता! यह सब उसी परम के लक्षण हैं। निश्चिंतता! यह सब उसी के लक्षण हैं और यह सबतुम, सब में पाओगे। इंसान के अलावा!

– ‘संवाद’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

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