61 शांत कैसे रहे || आप बड़े शांत हैं और मैं बड़ा अशांत हूं। मुझे शांत होना है।

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ओशो के प्रवचन


ओशो एक फकीर के पास कोई मिलने गया था। वह उस फकीर से वह कहने लगा, आप बड़े शांत हैं और मैं बड़ा अशांत हूं। मुझे शांत होना है, आप कोई रास्ता बता दें। उस फकीर ने कहा - भाई ठीक है, मैं शांत हूं, तुम अशांत हो, बात खत्म हो गई। मैं तो कभी तुम्हारे पास पूछने नहीं आया कि आप अशांत हैं, आप मुझे अशांत होने का रास्ता बता दें।"
उस आदमी ने कहा - ठीक है, आप पूछने नहीं आए क्योंकि आप शांत हैं, लेकिन मैं अशांत हूं। मुझे आप जैसा होना है, मुझे रास्ता बता दें।" उस फकीर ने कहा - अगर मुझ जैसे होने की कोशिश की तो और अशांत हो जाओगे। अगर शांत होना हो, तो जो हो उसके लिए राजी हो जाओ। किसी और जैसे होने की कोशिश मत करो।"
ठीक कहा उस फकीर ने। लेकिन वह आदमी न माना। उसने कहा - नहीं, कोई रास्ता बताएं।" फकीर उसे हाथ पकड़ कर बाहर ले गया और बाहर एक चिनार का वृक्ष है आकाश को छूता हुआ, चांदनी में खड़ा। फकीर ने कहा - उस वृक्ष को देखते हो?"
उस आदमी ने कहा - देखता हूं।"
फेकीर ने पूछा - देखते हो कितना लंबा है?"
उसने कहा - देखता हूं।" पास में एक गुलाब की झाड़ी है छोटी सी, जमीन को छूती हुई।
फकीर ने उससे कहा - इस झाड़ी को देखते हो? इस पौधे को देखते हो?"
उस आदमी ने कहा - देखता हूं।"
उस फकीर ने कहा - मैं बीस साल से रह रहा हूं इन्हीं झाड़ियों के पास, इसी वृक्ष के पास। मैंने कभी इस छोटे पौधे को बड़े पौधे से पूछते नहीं सुना कि तू बड़ा लंबा है, मैं कैसे लंबा हो जाऊं, यह बता दे। यह छोटा पौधा अपने छोटे होने से बड़ा आनंदित है। यह बड़ा पौधा अपने बड़े होने से बड़ा आनंदित है। यह बड़ा पौधा छोटा नहीं होना चाहता है, यह छोटा पौधा बड़ा नहीं होना चाहता है। और चूंकि कोई कोई नहीं होना चाहता है, इसलिए इनकी दुनिया में बड़े-छोटे का कोई सवाल नहीं है - जो है, वह है।"
लेकिन आदमी ने बड़े सवाल पैदा कर लिए हैं। हर आदमी किसी और जैसा होने की कोशिश में लगा हुआ है। सब हमारी आंखें भटक रही हैं चारों तरफ कि कौन किस जैसा हो जाए। और इस जाल में इतनी मुसीबत हो गई है कि कोई भी वह नहीं हो पा रहा है जो होने के लिए भगवान प्रत्येक को अधिकार देता है। जो अधिकार है मेरा, वह मैं नहीं हो पा रहा हूं और जो मैं नहीं हो सकता हूं उसके होने की कोशिश कर रहा हूं! जो मेरी नियति है, जो मेरी डेस्टिनी है, जो मैं हो सकता हूं, वह मैं नहीं हो रहा हूं।
लिंकन अमरीका का राष्ट्रपति हुआ। वह गरीब का लड़का था। लोगों को बड़ी तकलीफ हो गई उसके राष्ट्रपति हो जाने से। और जिस दिन, पहले दिन सीनेट में खड़ा हुआ तो एक आदमी ने खड़े होकर कहा कि महाशय लिंकन, यह मत भूल जाना कि तुम्हारे बाप एक मोची थे। लिंकन की आंखों में खुशी के आंसू आ गए और उसने जो कहा, वह याद रखने जैसा है।
लिंकन ने कहा, धन्य हैं मेरे मित्र, जिन्होंने यह याद दिला दी। एक बात मैं कहना चाहता हूं कि मेरे बाप जितने अच्छे मोची थे उतना अच्छा प्रेसिडेंट शायद मैं नहीं हो सकूंगा। दूसरी बात लिंकन ने यह कही कि क्या मैं पूछ सकता हूं, जहां तक मुझे याद आती है, जिन मित्र ने मेरे पिता की याद दिलाई है, मेरे पिता उनके घर के जूते भी बनाते थे।
क्या मैं पूछ सकता हूं कि कोई जूता अब तक गड़ रहा है? कोई जूता गलत बना है? मेरे पिता को मरे वर्षों हो गए-तकलीफ दे रहा है? अगर तकलीफ दे रहा हो तो मुझे कहें, हालांकि मेरे पिता की यह ख्याति थी कि उनके जूते ने कभी किसी को तकलीफ नहीं दी, वे अपने काम में बहुत कुशल थे।
एक कुशल शिक्षक होने का भी आनंद है। एक गिट्टी फोड़ने वाले की भी अपनी कुशलता है। लेकिन हम सब दौड़ में लगे हैं! हम सब दौड़ में लगे हैं कि हम दूसरे जैसे हो जाएं, इसलिए कोई आदमी कुशल नहीं हो पाता। क्योंकि कुशल तो हम वहीं हो सकते हैं, जो हम हो सकते हैं। शिक्षा का एक मात्र लक्ष्य होना चाहिए कि हम प्रत्येक व्यक्ति को उसकी नियति का उदघाटन करा दें।
हम उसे उदघाटन करा दें कि वह क्या हो सकता है। और वह जो हो सकता है, उसके होने के लिए उपकरण जुटा दें, और वह जो हो सकता है, उसके होने के लिए सुविधा जुटा दें। एक बीज को हम डाल देते हैं, फिर खाद डाल देते हैं, फिर पानी डाल देते हैं। फिर बीज से अंकुर निकल आता है। बस, शिक्षा अंकुरण बननी चाहिए, आरोपण नहीं।
यह अंतिम बात कहना चाहता हूं, शिक्षा अंकुरण बननी चाहिए, आरोपण नहीं। बीज मैं हूं। शिक्षा भूमि बननी चाहिए, खाद बननी चाहिए, पानी बननी चाहिए | 

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