धर्मनिष्ठ सबसे अजेय है। - The pious is the most invincible.- 53

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धर्मनिष्ठ सबसे अजेय है।

देवता और दैत्यने मिलकर अमृत के लिये समुद्रमन्थन किया और अमृत निकला भी, किंतु भगवान् नारायणके कृपापात्र होनेसे केवल देवता ही अमृत-पान कर सके। दैत्य छले गये, उन्हे परिश्रम ही हाथ लगा। परिणाम तो देवासुर-सग्राम होना ही था । उसमें भी अमृत-पानसे अभर बने देवता ही विजयी हुए । दैत्यराज बलि तो युद्धमें मारे ही गये थे, किंतु आचार्य शुक्रने बलि तथा युद्धमें मरे अन्य दैत्योको भी अपनी संजीविनी विद्यासे जीवित कर लिया । वलि अपने अनुचरोंकै साथ अस्ताचल चले गये ।।

अपनी सेवासे बलिने आचार्य शुक्रको प्रसन्न कर लिया । आचार्यने एक यज्ञ कराया । यज्ञकुण्डसे प्रकट होकर अग्निने बलिको दिव्य रथ, अक्षय त्रोण तथा अन्य शस्त्र दिये । अब फिर बलिने खर्गपर चढ़ाई कर दी । इस बार बलिका तेज इतना दुर्धर्ष था कि देवराज इन्द्र उन्हें देखते ही हताश हो गये । देवगुरु बृहस्पतिने भी देवताओंको चुपचाप भागकर पर्वतीय गुफाओमें छिप जानेका आदेश दिया । अमरावतीपर बिना युद्ध बलिने अधिकार कर लिया ।

‘स्वर्गके सिंहासनपर वही स्थिर रह सकता है, जिसने सौ अश्वमेध यज्ञ पूर्ण किये हों । कोई भी कर्म तभी फल देता है, जब वह कर्मभूमि पृथ्वीपर किया गया हो । खर्गमे किये कर्म कोई फल नहीं देते। तुमने खर्गपर अधिकार कर लिया है, किंतु यह अधिकार बना है, इन लिये । ध न हुन् ने लेने शन्।ि' व झन् बा नमः ।।

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उनै ः ३ करने लगे । न्न्यिानों ने यह निर्षि पूरे हो । न्निने अश्व प्रारम्भ । क। | मना दिति ने एन ए इ . ३ न दी थी । इन्होंने अपने पनि भई ने प्रार्थना की. वो? उगः इन्। *. जिम में एक नि दूर है। न ।' नदिन द व भन्नर दिन् । अदितिने बड़ी श्रद्धा नग्न १२ ग निमः । उन्नड़ हो गद नागने में इन दिन। गन्ने - 'रि' है। * २ . धम्मद इन रक्षा बन्न । ***** : वादा २ दि * : । ॐ मः । ने ? वि. नई त । ३त । कामना । नहीं नी । * नुन पुत्रनाः ॐ ॐ देना उदर न्यर्ग युनि दिगः । इग्दान देकर भग्न्यान ईन हो गई । अदिति* गर्भ उन्होने बम्नमें अनः आन्ग नि । नर्षि ने ऋतिक ना अन्नई सुन्न अथ बोपत्री-इन् । अने बानन बनी शट और इइ पनैि टिने नद्धा ब, छत्ता ये, इस्ट और इभ अन्टु लिय.
झारी में गन्न झाद मान जन्त्री लाने थे । दैत्यराज बन्द्रिय अन्तिम अश्वमेध यज्ञ भी पूर्णाहुतिके न्हि । शा द्वार मूनिगन् नाग्डके मान २३ नन पत्रे. तब उनके सम्मानमे सर्दी र ३ =टि > द सन्य उई हो गये।  * = दिने उन्हें उछालनग्र बैं । उनके चरण र उनकी पूजा की | अन्नने नन्नतापूर्वक बटिने हाथ दिन चहा---'आर ब्रह्मचारी ब्रह्माकुमार है । ३ पुग्नेने में अन्य हो गया । अब आप जिन उद्देश्यले २ है. अट नेक्री कृश व । ३ छ और माँगना चाहे, माँग ले ।। न् भन्ने दैन्य, औदाईकी प्रामा की. इनमें चर्चा दौर में दानशतकी भी प्रशन् । इतना दग्, उन्होने कहा---ॐ अपने इन नन पद भूमि चाइये ।। * इँन परें और बैं---विरार ' आप पिइन् ।.टि न बाद ही ! अने, भूमि ही • है । इतनी भनि । म , जिनने दुहारी। * बढ़ जात ।' | *नु नि नीनों लोक वाहिद, व आजीविका मात्र दिय भूमि क्यों ले । उई गम्भीरताने मन बा--"गन् ' नृ। इन चुनी होती है। पति है जैन इद मुनि नष्ट न हो तो तृष्णा न गये चाहन. नि पी आमना इन बुरा झुण्डली भ न्न और आप जानते ही है कि कृष्णार्की तृप्ति नो गया कि गन्त्र पार भी नहीं होती। तृष्णा जाग्त् के आने कुछ अच्छा नहीं किया । मुझे न और नैरे पैसे नदी तीन पद मूनि दे हैं--- टिळे टनना ही बहुत है ।। अच्छी नान ! जैसे आप प्रसन्न रहें। बलि हँन नल्य ने लिये पन्नील जलपात्र माँगा । नु इतनेने शुक्राचार्य बामनों पहचान गये थे। उन्होंने अपने शिष्यों य--‘मृर्छ । क्या करने जा । रहा है ? ये नन्हे-से ब्राह्मणकुमार नहीं है। इस वेधमे नेरे सामने ये साक्षात् मायामय विष्णु खडे है। ये अपने एक पदमे भूलोक और दूसरेमे स्वर्गादि लोक नाप लेगे । तीसग पद ग्वनेको स्थान छोडेगे ही नहीं । सर्वत्र उन्हे देकर नु कहाँ रहेगा ? इन्हे हाथ जोड़ और कह है कि देवना | कोई और यजमान हो । मुझपर तो कृपा ही करो । | ये साक्षात् विष्णु है ! बलि भी चौके । अपने आचार्यपर अविश्वास करनेका कारण नहीं था । मस्तक झुकाकर दो क्षण उन्होंने सोचा और तब उस महामनवीने मिर उटाया-भगवन् ! आप इतने बड़े-बडे यज्ञोंसे मेरे द्वारा जिन यज्ञमूर्ति विष्णुकी आराधना करते है, वे साक्षात् विष्णु ये हो या और कोई, मैं तो भूमि देनेको कह चुफो । प्रह्लादका पौत्र ‘हॉ' करके कृपणकी भॉनि अस्वीकार कर दे, यह नहीं हो सकता । मेरा कुछ भी हो जाय, द्वारपर आये ब्राह्मणको मैं शक्ति रहते विमुख नहीं करूंगा।' | शुक्राचार्यको क्रोध आ गया । उन्होंने गेयपूर्वक कहा–'तू मेरी बात नहीं मानता, अपनेको वडा धर्मात्मा और पण्डित समझता है, इससे तेरा वैभव तत्काल नष्ट हो जायगा ।। बल्नेि पस्तक झुकाकर गुरुदेवका शाप स्वीकार कर छिया किंतु अपना निश्चय नहीं छोडा । जल लेकर उन्होने वामनको तीन पद भूमि देनेका सकल्प कर दिया । भूनिदान लेने ही वामन भगवान्ने पिरारूप धारण कर लिया | एक पदमै पूरी भूमि उन्होंने नाप ली और दूसरा पद उठाया तो उसके अङ्गुष्ठका नख ब्रह्माण्डावरणको भेदकर बाहर चला गया । अत्र भगवान्ने बलिसे कहा'तू बडा दानवीर बनता था। मुझे तूने तीन पद भूमि दी है । दो पदमे ही तेरा त्रिलोकीका राज्य पूरा हो गया । अव तीसरे पदको रखनेका स्थान ब्रता ।।
बलिने मस्तक झुकाकर कहा--सम्पत्ति सम्पत्तिका स्वामी बडा होता है । आप तीसरा पद मेरे मस्तकपर रखे और अपना दान पूर्णत, ले ले । भगवान्ने तीसरा पद बलिके मस्तकपर रखकर उन्हें धन्य कर दिया । इन्द्रको स्वर्ग प्राप्त हुआ । खय वामनभगवान् उपेन्द्र बने इन्द्रकी रक्षाके लिये, किंतु बलिको तो उन्होंने अपने आपको ही दे दिया । स्वर्ग में भी अधिक ऐश्वर्यमय सुतललोक प्रभुने बलिको निवासके लिये दिया । अगले मन्वन्तरमे वलि इन्द्र वनेगे, यह आश्वासन दिया । इससे भी आगे यह वरदान दिया कि । वे अखिलेश्वर स्वयं हाथमें गदा लिये सदा सुनलमें बलिके द्वारपर उपस्थित रहेगे । इस प्रकार ले जाकर भी वलि विजयी ही रहे और दयामय प्रभु उनके द्वारपाल बन गये । —सु० सिं० ( श्रीमद्भागत ८ । १५-२३)

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