44. अंतर्यात्रा 9

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ओशो संग अ‍ॅंनतरयात्रा

उपनिषद--कठोपनिषद--ओशो ( नौवां--प्रवचन) आत्‍म ज्ञान ही प्रत्‍यक्ष ज्ञान—नौवां प्रवचन

द्वितीय अध्‍याय—

प्रथम वल्‍ली :

परांचि खानि व्‍यतृणत् स्‍वभंभूस्‍तस्‍मात्‍परांपश्‍यति नान्‍तरात्‍मन्।

कस्विद्धीर: प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्।। 1।।

पराच: कामाननुयन्ति बालास्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य याशम्।

अथ धीरा अमृतत्व विदित्वा ध्रुवमधुवेष्विह न प्रार्थयन्ते।। 2।।

येन स्वयं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शान्‍श्‍च मैथुनान्।

एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते।। एतद्वै तत्।।3।।

स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति।

महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति।।4।।

य इमं मध्वदं वेद आत्मानं जीवमन्तिकात्।

ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते।। एतद्वै तत्।। 5।।

यः पूर्व तपसो जातमद्भ्य: पूर्वमजायत।

गुहां प्रविश्यतिष्ठन्तयो भूतेभिर्व्यपश्यत।। एतद्वै तत्।। 6।।

या प्राणेन सम्मवत्यदितिदेंवतामयी।

गुहा प्रविश्य तिष्ठन्तीं या भूतेभिर्व्यजायत।। एतद्वै तत्।। 7।।

अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इव सुमृतो गर्भिणीभि:।

दिवे दिव ईड्यो जागृवद्भिर्हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्नि:।। एतद्वै तत्।। 8।।

यतश्चोदेति सूयोंऽस्तं यत्र च गच्छति।

तं देवा: सर्वे अर्पितास्तदु नात्येति कश्चन।। 9।।

यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह।

मृत्यो: स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति।। १०।।

स्वयं प्रगट होने वाले परमेश्वर ने समस्त इंद्रियों के द्वार बाहर की ओर जाने वाले ही बनाए हैं इसलिए (मनुष्य इंद्रियों के द्वारा प्राय: ) बाहर की वस्तुओं को ही देखता है अंतरात्मा को नहीं। किसी ( भाग्यशाली) बुद्धिमान मनुष्य ने ही अमरपद को पाने की इच्छा करके चक्षु आदि इंद्रियों को बाह्य विषयों की ओर से लौटाकर अंतरात्मा को देखा है ।।1।।

जो बाल— बुद्धि वाले बाह्य भोगों का अनुसरण करते हैं वे सर्वत्र फैले हुए मृत्यु के बंधन में पड़ते हैं किंतु बुद्धिमान मनुष्य नित्य अमरपद को विवेक द्वारा जानकर इस जगत में अनित्य भोगों में से किसी को ( भी ) नहीं चाहते।।2।।

जिसके अनुग्रह से ( मनुष्य) शब्दों को स्पर्शों को रूप— समुदाय को रस को गंध को और स्त्री— प्रसंग आदि के सुखों को अनुभव करता है उसी के अनुग्रह से ( यह भी जानता है कि) यहां क्या शेष रह जाता है अर्थात कुछ भी नहीं। यही है वह ( परमात्मा जिसके विषय में तुमने पूछा था)।।3 ।।

स्वप्न के दृश्यों को और जाग्रत—अवस्था के दृश्यों को इन दोनों अवस्थाओं के दृश्यों को ( मनुष्य) जिससे बार—बार देखता है उस सर्वश्रेष्ठ सर्वव्यापी सबके आत्मा को जानकर बुद्धिमान शोक नहीं करता।। 4।।

जो मनुष्य कर्मफलदाता सबको जीवन प्रदान करने वाले (तथा) भूत (वर्तमान) और भविष्य का शासन करने वाले इस परमात्मा को (अपने) लिए समीप जानता है उसके बाद वह (कभी) किसी की निंदा नहीं करता। यही है वह ( परमात्मा जिसके विषय में तुमने पूछा था)।। 5।।

जो जल आदि पांच तत्वों से पहले ही अजन्मा था उस सबसे पहले तप से उत्पन्न हृदय— गुहा में प्रवेश करके जीवात्माओं के साथ स्थित रहने वाले परमेश्वर को जो पुरुष देखता है ( वही ठीक देखता है)। यही है वह ( परमात्मा जिसके विषय में तुमने पूछा था)।। 6।।

जो देवी अदिति प्राणों के सहित उत्पन्न होती है जो प्राणियों के सहित उत्पत्र हुई है ( तथा जो) हृदयरूपी गुहा में प्रवेश करके वहीं रहने वाली है उसे ( जो पुरुष देखता है वही यथार्थ देखता है)। यही है वह ( परमात्मा जिसके विषय में तुमने पूछा था)।। 7।।

जो सर्वज्ञ अग्निदेवता गर्भिणी स्त्रियों द्वारा भली प्रकार धारण किए हुए गर्भ की भांति दो अरणियों में सुरक्षित है छिपा है ( तथा जो) जाग्रत है (और) हवन करने योग्य सामग्रियों से युक्त मनुष्यों द्वारा प्रतिदिन स्तुति करने योग्य ( है), यही है वह ( परमात्मा जिसके विषय में तुमने पूछा था)।। 8।।

जहां से सूर्यदेव उदय होते हैं और जहां अस्त होते हैं सभी देवता उसी में समर्पित हैं। उस परमेश्वर को कोई (कभी भी) नहीं लांघ सकता। यही है वह ( परमात्मा जिसके विषय में तुमने पूछा था)।। 9।।

जो परब्रह्म यहां ( है), वही वहां (परलोक में भी है)। जो वहां ( है), वही यहां (इस लोक में) भी है। वह मनुष्य मृत्यु से मृत्यु को (अर्थात बारंबार जन्म— मरण को) प्राप्त होता है जो इस जगत में (उस परमात्मा को) अनेक की भांति देखता है।। 10।।



अत्मिज्ञान ही प्रत्यक्ष ज्ञान—

नुष्य की इंद्रियां केवल बाहर की ओर उगख होती हैं और हो सकती हैं। भीतर की ओर उन्यूख होने का कोई प्रयोजन नहीं है।

जैसे कोई वैज्ञानिक दूर के तारों की खोज के लिए दूरबीन बनाता है। तो उस दूरबीन से दूर के तारे तो दिखाई पड़ जाते है, लेकिन दूरबीन के पीछे छिपा हुआ वैज्ञानिक उस दूरबीन से दिखाई नहीं पड़ता, जो बिलकुल पास ही खड़ा है। दूरबीन से जो आंखें सटाकर खड़ा है। दूरबीन उस वैज्ञानिक को नहीं पकड़ती;दूर, करोड़ो मील दूर के तारों को पकड़ लेती है। दूरबीन बनी ही है दूर को देखने के लिए। वह जो देखने वाला है, उसे देखने के लिए तो किसी भी दूरबीन की कोई जरूरत नहीं है।

इंद्रियां हैं पदार्थ को देखने के लिए। स्वयं को देखने के लिए इंद्रियों की कोई भी जरूरत नहीं है। स्वयं को तो बिना इंद्रियों के ही देखा जा सकता है। इसलिए इंद्रियां भीतर की तरफ नहीं जातीं, बाहर की तरफ जाती हैं। पर इससे बड़ी उलझन खड़ी होती है। इससे उलझन यह खड़ी होती है कि दूर तारों को देखने वाला वैज्ञानिक धीरे— धीरे यह भूल भी जा सकता है कि वह भी है। तारे ही सब कुछ हो जा सकते हैं। दूरबीन को थामे — थामे वह जो पीछे देखने वाला है, वह विस्मरण हो जा सकता है, क्योंकि निरंतर वही दिखाई पड़ेगा जो बाहर है, सतत वही दिखाई पड़ेगा जो बाहर है। और जो भीतर छिपा है, वह दिखाई न पड़ने से स्मृति से खो सकता है।

यही हुआ है। हमारी सारी इंद्रियां बाहर की तरफ जाती हैं। मैं हाथ से आपको छू सकता हूं। मैं हाथ से अपनी देह को भी छू सकता हूं क्योंकि वह भी पराई है और बाहर है। हाथ से मैं अपने को नहीं छू सकता जो देह में छिपा है। हाथ से मैं छूने वाले को नहीं छू सकता।

जब मैं अपना हाथ आपकी तरफ बढ़ाता हूं तो सिर्फ हाथ ही नहीं बढ़ता, हाथ में छिपा हुआ मैं भी बढ़ता हूं। मैं बढ़ना चाहता हूं आपको छूना चाहता हूं इसीलिए हाथ बढ़ता है। हाथ तो छाया की तरह मेरे पीछे आता है। मैं चाहता हूं आपको छुऊं, तो मेरा हाथ अनुसरण करता है, मेरी आज्ञा का पालन करता है। लेकिन जब मैं आपको छूता हूं तब दो घटनाएं घट रही हैं—एक तो आप हैं जिसको मैंने छुआ, और एक मैं हूं जिसने छुआ; और एक हाथ है जिसके द्वारा छुआ, और एक आपका शरीर है जिसके द्वारा आपको छुआ गया।

आँख बहर की तरफ देखती है, उसे सब दिखाई पड़ जाता है। सिर्फ मैं जो भीतर छिपा हूं वह उसे दिखाई नहीं पड़ेगा। कान बाहर की तरफ सुनते हैं। स्वाद, रस,गंध, सब बाहर से संबंधित हैं।

इंद्रियों का निर्माण ही इसलिए हुआ है कि हम जगत से परिचित हो सकें। दूसरे से, अन्य से परिचित हो ने की व्यवस्था है। लेकिन वह जो भीतर छुपा है, वह इस परिचय में अपरिचित हो जाता है। जो हमारा अपना, गाना होना है,वह आच्छादित होता चला जाता है। हम वस्तुओं को जानते—जानते उसे भूल ही जाते हैं जो जानने वाला है। यह बात इस सूत्र की पहली बात है।

स्वयं प्रगट होने वाले परमेश्वर ने समस्त इंद्रियों के द्वार बाहर की ओर जाने वाले ही बनाए हैं। इसलिए मनुष्य इंद्रियों के द्वारा प्राय: बाहर की वस्तुओं को ही देखता है अंतरात्मा को नहीं। किसी भाग्यशाली बुद्धिमान मनुष्य ने ही अमरपद को पाने की इच्छा करके चक्षु आदि इंद्रियों को बाह्य विषयों की ओर से लौटाकर अंतरात्मा को देखा है।

इसमें एक बात खयाल में ले लेने जैसी है, क्योंकि उससे बहुत भ्रांति साधकों के जगत में है। आंख को भीतर लौटाने का क्या अर्थ है? क्या आंख भीतर लौटाई जा सकती है? आंख भीतर लौटाई ही नहीं जा सकती। आंख बाहर ही देख सकती है। आंख के भीतर देखने का कोई उपाय नहीं। देखने वाले को आंख से देखने का कोई उपाय नहीं। लेकिन संतो ने कहा है, योगियों ने कहा है, लौटा लो आंख को, उलटी कर लो धारा।

लौटाने का कुल मतलब इतना है कि बाहर की तरफ मत जाओ। जो ऊर्जा आंख से बाहर जाती है, उसे बाहर मत जाने दो। बाहर की तरफ जाने वाला द्वार बंद हो जाए, तो जो देखने वाला बाहर की तरफ जाता है, बाहर न जाकर वह देखने वाला अपनी तरफ लौट आएगा। वहां कोई आंख न होगी, लेकिन स्वयं को देखने के लिए आंख की कोई जरूरत ही नहीं है। स्वयं का देखना बिना आंख के हो जाता है। वह चक्षुरहित दर्शन है।

स्वयं को सुनने के लिए कोई कानों को भीतर लौटाने की जरूरत नहीं है। सिर्फ कान बाहर न सुनें। बाहर की ध्वनि—तरंगों का जाल कान से छूट जाए। कान बाहर के प्रति उपेक्षा से भर जाएं। तो जो ऊर्जा कान से बाहर की तरफ जाती है बाहर न जाए, तो वह ऊर्जा भीतर की ध्वनि को अपने आप सुन लेती है। उस ध्वनि को सुनने के लिए कान की कोई भी जरूरत नहीं है।

इंद्रियां भीतर लौट आएं, इसका केवल इतना ही अर्थ है कि बाहर न जाएं, बाहर की तरफ प्रवाह न हो। तो जैसे कोई झरना बहता है और अवरुद्ध हो जाए और कहीं जाने का माग न मिले, तो झरना अपनी तरफ लौट आएगा, झरने का बहना बंद हो जाएगा और एक झील बन जाएगी। ऐसे ही चेतना बाहर जा रही है पांचों इंद्रियों से। वह बाहर न जाए तो चैतन्य की झील भीतर निर्मित हो जाती है। वह झील स्वयं—बोध—संपन्न है। वह झील स्वयं को देखने, स्वयं को सुनने, स्पर्श करने में संपन्न है। लेकिन वे सारे अनुभव अतींद्रिय हैं। उनका इंद्रियों से कोई भी लेना—देना नहीं है।

एक सूफी फकीर हुआ बायजीद। वह निरंतर कहा करता था कि मेरे गुरु ने तीन युवकों को एक—एक कबूतर दे दिया और कहा कि ऐसी जगह जाकर कबूतर को मार डालना जहा कोई देखने वाला न हो। एक युवक तो पांच मिनट बाद कबूतर को मारकर वापस आ गया। वह बगल की गली में गया। वहा कोई भी नहीं था। उसने गरदन मरोड़ी। वापस आ गया। दूसरा युवक तीन दिन बाद कबूतर को मारकर लौटा। उसने बड़ी खोजबीन की; कहीं भी भूल—चूक से कोई देख न ले। तो वह एक गहरी गुफा में गया। उसने गुफा के द्वार पर पत्थर लगा दियां। किसी के आने का कोई उपाय न रहा। गहन अंधकार था। वहां कोई देख भी नहीं सकता था, आ भी जाए तो भी। उसने गरदन मरोड़ दी।

तीसरा युवक तीन महीने के बाद कबूतर को लिए वापस लौटा। गुरु ने कहा कि क्या तीन महीने में तुम ऐसी कोई जगह न खोज पाए, जहा कोई भी न हो? उसने कहा कि तीन जन्मों में भी खोजना संभव नहीं है। तीन महीने बहुत मेहनत कर ली। गहन गुफा में गया, अंधकार था, लेकिन मैं तो देख ही रहा था; कबूतर तो देख ही रहा था। दो तो मौजूद थे। कबूतर की भी आंखे बंद कर दू तो भी मैं मारने वाला तो देखता ही रहूंगा—कितना ही गहन अंधकार हो!

बायजीद के गुरु ने कहा कि तू ही कैवल स्वयं को खोजने में सफल हो पाएगा। बाकी दो की कोई आंतरिक खोज नहीं है। दो को विदा कर दिया, उस एक को रोक लिया। क्योंकि तुझे इतना स्मरण है कि इंद्रियां भी जहा नहीं देख पातीं, प्रकाश जहां मौजूद नहीं, वहां भी तू तो देख ही रहा है। तेरे देखने के लिए इंद्रियों की कोई भी जरूरत नहीं है।

कितना ही गहन अंधकार हो कमरे में, आपको कुछ भी न दिखाई पड़ता हो, लेकिन आप हैं, इतना तो पता चलता ही रहता

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