16 जीवन एक धोखा है

Share:

       बुद्ध कहा करते थे अपने भिक्षुओं को कि जीवन एक धोखा है और जो इस धोखे को समझ लेता है, उसकी पकड़ इस जीवन पर छूट जाती है।
       यह शूत्र समझने की कोशिश करें।जीवन एक धोखा है। यहाँ जैसा भी दिखाई पड़ता है वैसा नहीं है। और यहाँ जैसी आशा पकती है वैसा कभी फल नहीं मिलता। यहां जो मान कर हम चलते हैं उपलब्धि पर उसे कभी वैसा नहीं पाते। खोजते हैं सुख मिलता है दुख। खोजते हैं जीवन आती है मौत। खोजते हैं यश अपयश के अतिरिक्त हाथमें कुछ नहीं आता। खोजते हैं धन भीतर की निर्धनता बढ़ती चली जाती है। चाहते हैं सफलता असफलता की लंबी कथा पूरे जीवन सिद्ध होती है। जीतने के लिए निकलते हैं हार कर लौटते हैं।
         इस पूरी जिंदगी के धोखे को ठीक से देख लेना जरूरी है। उस साधक के लिए जो स्वयं के भीतर जाना चाहता है।क्योंकि जीवन अगर धोखा है तो उड़ पर पकड़ छूट जाती है। तत्पर बंधी हुई जंजीर से हाथ मुक्त हो जाते हैं। जानते हैं फिर भी देखते नहीं हैं, शायद देखना नहीं चाहते।
        जीवन शायद धोखा नहीं है। हम अपने को जो देखना चाहते हैं। जीवन निमित्त है। क्योंकि वही जीवन किसी को जागने का कारण भी बन जाता है। औऱ वही जीवन किसी के सोने का आधार भी बन जाता है। शायद ऐसे ही है जैसे राह पर चलते हुए अंधेरे में कोई रस्सी सांप जैसी दिख जाए। रस्सी को सांप जैसा दिखने की कोई भी आकांक्षा नहीं है। रस्सी को कुछ पता भी नहीं है। लेकिन मुझे रस्सी सांप जैसी दिख सकती है। रस्सी में मैं सांप को आरोपित कर लेता हूँ। फिर दुख आपदाओं, पसीनें से लथपथ भयभीत। और वहाँ कोई सांप नहीं है। लेकिन मेरे लिए है। रस्सी ने धोखा दिया है ऐसा कहना ठीक नहीं। रस्सी से मैंने धोखा खाया है। ऐसा ही कहना ठीक है। पास जाओ, देखो और रस्सी दिखाई पड़ जाए तो भय तत्काल तिरोहित हो जाएगा। पसीने की बूंदें सूख जाएंगी। फिर दिल की धड़कनें वापिस अपनी गति ले लेंगी। खून अपनी आम गति में आ जाएगा। और मैं हंसुगा और उसी रस्सी के पास बैठ जाऊँगा, जिस रस्सी से भागा था। जिंदगी में उल्टी हालात है। यहाँ आपने रस्सी को सांप नहीं समझा है, सांप को रस्सी समझ लिया है। इसलिए जिसे आपने जोर से पकड़ा है कल अगर पता चल जाए कि वह सांप है तो छोड़ने में तत्काल क्षण भर की देरी भी नहीं करोगे। इसलिए जीवन को उसकी सच्चाई में, उसके तथ्यों में  देख लेना जरूरी है।
       जब बच्चा पैदा होता है, तो रोता है तब हम सब खुश हो कर हंसते हैं और प्रसन्न होते हैं। कहते हैं एक बार भूल चूक हुई है जगत में। सिर्फ एक बार ऐसा हुआ है कि एक बच्चा जरथुष्ट्र पैदा होते वक़्त हंसा। अब तक कोई बच्चा पैदा होते वक़्त हंसा नहीं। और तब से हज़ारों लोगों ने पूछा है कि जरथुष्ट्र होते वक़्त क्यों हँसा। अब तक कोई उत्तर नहीं दे रहा।
        मुझे लगता है जरथुस्त्र हँसा होगा उन लोगों को देखकर जो बैंड बाजे बजाते थे और खुश हो रहे थे। क्योंकि हर जन्म मृत्यु की खबर है। हंसा होगा जरथुस्त्र जरूर। वो लोगों पर हँस रहा था। जो सांप को रस्सी समझ कर पकड़ रहे थे। वो उन पर हँसा होगा जो जिंदगी को उनके चेहरों से  पहचानते थे, उनकी आत्मा से नहीं। हम भी जिंदगी को उनके चेहरों से ही पहचान कर जीते हैं। ऐसा नहीं है कि जिंदगी की आत्मा बहुत बार दिखाई नहीं पड़ती। हमारे न चाहते हुए भी जिंदगी बहुत बार अपना दर्शन देती है। लेकिन हम आँख बंद कर लेते हैं।
        मेरे एक मित्र हैं।उनका एक पुत्र मर गया। अब वे रोते थे छाती पीटकर। मैं उनके घर में गया। वे कहने लगे कि यह कैसे हो गया कि मेरा जवान बेटा मर गया। मैंने कहा कि ऐसा मत पूछिए। ऐसा पूछिये कि यह कैसे हो गया कि आप अस्सी साल के हो गए हैं और अभी तक नहीं मरे? यहाँ जवान का मरना आश्चर्य नहीं यहाँ मृत्यु आश्चर्यजनक होनी ही नहीं चाहिए। क्योंकि मृत्यु ही अकेली निश्चित है औऱ सब आश्चर्यजनक हो सकता है। मृत्यु एक मात्र निश्चित है। जिसके सम्बन्ध में आश्चर्य की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन मृत्यु होना कोई आश्चर्य नहीं। इस जगत में सबकुछ अनिश्चित है। मृत्यु भर निश्चित है। सब कुछ हुआ है, सब कुछ हो सकता है। सब कुछ में बदलाहट हो जाती है। बस एक मृत्यु ध्रुव तारे की तरह बीच में खड़ी रहती है। लेकिन उसको हम बहुत आश्चर्य से लेते हैं। जब हम सुनते हैं तो लगता है कि बहुत बड़ी आश्चर्य जनक घटना घट गई। कुछ अनहोनी घटना घट गई है। लोग कहते हैं मृत्यु नहीं होनी चाहिए थी। और सच यह है कि होनी ही निश्चित है। बाकी सब अनहोनी। बाकी न तो हम कहीं पूछने जा  सकेंगे कि क्यों नहीं हुआ। एक बार मृत्यु न हो तो सारा जगत आश्चर्य से भर जाएगा। लेकिन निश्चित को  नहीं झुठला सकते।जीवन में हम सभी सत्यों को झुठलाए हुए हैं। जीवन असुरक्षित है। जीवन की सारी की सारी व्यवस्था असुरक्षित है। लेकिन हम बड़ी सेकुरिटी लिए चले जाते हैं।ओर हम कहते हैं कि सब ठीक है। लेकिन वो हमारा सब ठीक वैसा ही है जैसे कोई सुबह मिलता है और आप से पूछता है कैसे हैं? और आप कहते हैं सब ठीक है। सब कभी भी ठीक नहीं। कुछ भी ठीक हो यह भी संदिग्ध है। सब सदा गैर ठीक है। लेकिन आदमी का मन स्वयं को धोखे दिए चला जाता है और कहता है सब ठीक है। जहाँ कुछ भी ठीक नहीं है। जहाँ पैरों के नीचे से जमीन खिसकती चली जाती है। और हाथ की जीवन की रेख रोज कम होती चली जाती है। और जहां शिवाय मृत्यु के और कुछ पास आता ही नहीं मालूम होता है।
     बुद्ध भिक्षुओं को कहते थे, जिंदगी को देखो। मरघट पर जाकर देखो। लेकिन तुम मरघट पर भी जाते तो जो वह मर गया है, उसकी मृत्यु की चर्चा नहीं।समय को झुठला देते हैं। उसकी मृत्यु की चर्चा में इस भांति लौटते हैं, कि उस बेचारे के साथ अनहोनी घट गई है। बिना इस बात की चिंता किए कि हर मृत्यु की खबर हमारी मृत्यु की खबर है। हर मृत्यु की घटना हमारी मृत्यु की पूर्व सूचना है।हर मृत्यु मेरी ही मृत्यु है।
       अगर हम जीवन को उसके वास्तविक रूप में देख पाएं तो उसमें दखल कम हो जाती है। हमने मरघट गांव के बाहर बनाए हैं ये जानकर कि वो हमें दिखाई न पड़ें।
मरघट हम सुंदर बनाने में लगे हैं। जानकर कि उन मरघट के फूलों में मौत को छिपा दें। हम जीवन के इस जर्जर भवन को एक प्रवंचना एक डिस्कसन की भांति खड़ा कर दें।
       भीतर जिसे जाना है, अवचेतन में जिसे उतरना है, गहराइयाँ जिसे छूना है। उसे बाहर की पकड़ को स्थगित करना होगा। वो स्थिति तभी हो सकती है जब हम देखें कि क्या है? भली भांति इस जगत में दिखाई पड़ता है वैसा है नहीं। कितनी बार सुख चाहा है। और कितनी बार सुख मिला है। नहीं। हम कभी गणित करने नहीं बैठते। दिन में आदमी कितना कमाता है और कितना गंवाता है? शाम को सब हिसाब कर लेता है। लेकिन जिंदगी में हम कितना कमाते हैं और कितना गंवाते हैं। उसका हर शाम कभी हिसाब नहीं करते। रात सोते वक्त पांच मिनट सोच लेना जरूरी है कि दिन भर में कितना सुख पाया है? और कल जितने सुख सोचे थे कि आज इतने सुख पाएंगे। उन में से कितने मिल गए। और कल जिन दुखों को कभी नहीं सोचा था कि मिलेंगे। आज अचानक उन में  से कितने घर के मेहमान हो गए। काश हम थोड़े दिनों की सांझ को इसे सोचते रहें तो कल के लिए सुख की आशा बांधनी बहुत मुश्किल हो जाएगी। और जिस आदमी को सुख की आशा बाहर बांधनी असम्भव हो जाती है। उसी व्यक्ति की अन्तर्यात की गति शुरू होती है।
        उस व्यक्ति की अंतर्यात्रा कभी शुरू नहीं होती जिसके सुख की आशा बाहर बनी रहती है। सुख बाहर है तो व्यक्ति कभी गहराई में नहीं उतर सकता। सुख बाहर नहीं है तो शिवाय भीतर की गहराई में उतर जाने के और कोई उपाय नहीं रह जाता।
         इसलिए पहली बात जीवन एक धोखा है। जिसे देखते और जानते हैं वह जीवन। जिसे हमनेजीवन  समझा है वह एक भर्म है। लेकिन टूटता है वह धोखा।लेकिन टूटता है तब जब उसका कोई प्रयोग, उपयोग नहीं किया जा सकता। मौत के आखिरी क्षण में जब करने को कुछ भी नहीं बचता। और तब भी मुश्किल है कि टूटता हो। अक्सर तो ऐसा होता है कि मृत्यु के आखिरी क्षण में भी हम उन्ही कामनाओं को दोहराए चले जाते हैं। कल की आशाओं को भीतर बाँधे चले जाते हैं। भविष्य के सुखों को चाहे चले जाते हैं। और इसलिए वह मृत्यु फिर नया जन्म बन जाती है। और फिर वही चक्कर जो हमने भुला दिया था फिर शुरू हो जाता है। महाबीर या बुद्ध ने एक अद्भुत अनुठा प्रयोग किया था। और वह प्रयोग था कि जब भी कोई साधक आता तो वे कहते थे कि तुम अपने पिछले जन्मों के स्मरण में उतरो। उस स्मरण को महावीर जाति समरन कहते हैं। उसे ध्यान में उतारते हैं कि पहले तुम अपने पिछले जन्म जान लो। नए साधक आते तो वे कहते कि पिछले जन्म से हमें कोई प्रयोजन नहीं। हम शांत होना चाहते हैं, हम आत्मज्ञान जानना चाहते हैं, हम मोक्ष प्राप्ती चाहते हैं। महावीर कहते हैं वो तुम न पा सकोगे, न जान सकोगे। पहले तुम पिछले जन्म देख लो। उन्हें समझ भी न पड़ता कि पिछले जन्म देखने से क्या होगा? लेकिन महावीर कहते हैं कि दो चार जन्म तो तुम स्मरण कर ही लो।
      अब उसी प्रक्रिया से गुजारते। वर्ष लगता दो वर्ष लगते, औऱ तब व्यक्ति पिछले जन्मों की स्मृति में आता। फिर पूछते कि अब क्या ख्याल है? वह व्यक्ति कहता कि धन बहुत बार पा चुका, लेकिन फिर भी कुछ नहीं पाया। प्रेम मैं बहुत बार पा चुका फिर भी खाली हाथ रहा। यश के सिंहासन पर और भी जन्मों में पहुंच चुका और फिर मौत के अतिरिक्त कुछ भी नहीं मिला।
     महावीर कहते हैं हां अब ठीक है अब इस जन्म में यश पाने का ख्याल तो नहीं। पिछला जन्म हमें भूल जाता है। इसलिए जो हमने कल किया था उसे हम आज भी किये चले जाते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। आदमी इतना अद्भुत है। ऐसा नहीं है कि पिछला जन्म भी याद हो तो भी हम बदल जाएं। कल की तो तुम्हें अच्छी तरह याद है कि क्रोध किया था। खूब अच्छी तरह याद है। और क्या पाया था वह भी अच्छी तरह याद है। आज फिर क्रोध किया है, कल भी आप क्रोध करेंगे इस की सम्भावना ज्यादा है। कल भी सुख चाहा था। क्या मिला? ठीक से याद है। लेकिन आज फिर उसी तरह सूख चाह रहे हो। कल भी उसी तरह चाहोगे। रोज सुख चाहोगे रोज दुख मिलेगा।
    आदमी की अपने को धोखा देने की सामर्थ्य अनन्त मालूम पड़ती है। हर रोज कांटे चुभते हैं, फूल कभी हाथ मे आते नहीं। लेकिन फिर फूलों की खोज जारी हो जाती है। फिर खोज जारी रहती है। आदमी को देखकर ऐसा लगता है कि आदमी शायद कुछ सोचता ही नहीं है, शायद सोचने से डरता है। कहीं ऐसा न हो कि जैसे बच्चे तितलियों की ओर दौड़ रहे हैं। इसी तरह कहीं मैं सुख की तितलियों की ओर दौड़ना बन्द न कर दूं। शायद घबराता हूँ कि रुका तो कहीं छूट न जाएं। सहज डरता है कि जिंदगी को देख लूं तो कहीं जिंदगी की बदलाहट न करनी पड़े।
       लेकिन जिन्हें साधना के पथ में उतरना है। अप्रमाद में, जागरण में, चेतना में उन्हें स्मरण पूर्वक पहले सूत्र को  चौबीस घंटे ख्याल में रखना जरूरी है। उठे सो गए। स्मरण पूर्वक ध्यान करें कि कल भी उठे थे, परसों भी उठे थे। पचास वर्ष हो गए हैं उठते हुए क्या वही आकांक्षाएं आज पकड़ेंगी, जो कल पकड़ी थीं। कुछ करें मत, सिर्फ सुमरण करें just remember सिर्फ सुमिरण करें, ओर कुछ करें मत। कसम मत खाएं कि आज किया आधा। नहीं, कसम खाने का मतलब तो ये हुआ कि कल से कोई समझ नहीं मिलेगी। इसलिए कसम खानी पड़ रही है। कल का ही सुमरिन भर करें। कि ये मत कहें कि अब करूँगा। ये मत कहें कि कल क्रोध नहीं करूंगा। इतना ही कहें कि कल भी क्रोध किया था। परसों भी क्रोध किया था। परसों पछताया था, कल भी पछताया था। आज के लिए कोई निर्णय न लें। केवल कल का सुमरिन ही आज छाया की तरह घूमता रहेगा। क्रोध असम्भव हो जाएगा। सुख की दौड़ तिरोहित हो जाएगी। दूसरे से कुछ मिल सकता है, इसकी आशा क्षीण हो जाएगी। और जिंदगी पर पकड़ रोज रोज ढीली होने लगेगी। बुद्धि खुलने लगेगी। जैसे ही जीवन की पकड़ कम होती है भीतर प्रवेश शुरू हो जाता है। इसलिए पहला सूत्र जीवन एक धोखा है, इसका स्मरण रखे।
                         धन्यवाद।
                        संग्रहकर्त्ता उमेद सिंह सिंगल।

No comments