96 ईश्वर है या नहीं।. 9

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      गौतम बुद्ध के भगत आनन्द ने एक घटना की चर्चा की है। आनन्द ने बताया था कि जब वे बुद्ध के साथ किसी गांव से गुजर रहे थे। तो सुबह सुबह एक आदमी ने बुद्ध को प्रणाम करते हुए कहा कि मैं आस्तिक हूँ और मानता हूँ कि ईश्वर है। बुद्ध ने कहा कि नहीं, ईश्वर नहीं है। समझ में नहीं आता कि तुम आस्तिक क्यों बन गए। मैने खोजा है और पाया है कि ईश्वर नहीं है। वह चोंक गया। उसे लगा था कि बुद्ध आस्तिकता के बारे में कुछ और अच्छी बातें बताएंगे। पर बिल्कुल उल्टा हुआ।
          थोड़ी दूर जाने पर दूसरा गांव आया। दोपहर को एक ओर व्यक्ति आया उसने कहा मैं ईश्वर को नहीं मानता, मैं नास्तिक हूँ आप कुछ बताएं। उसका प्रश्न सुबह वाले व्यक्ति से बिल्कुल विपरीत था। बुद्ध ने कहा, व्यर्थ की बात करते हो। ईश्वर है, मैंने पाया है। छोड़ दो नास्तिकता।
          आनन्द कहते हैं मैं परेशान हो गया। बुद्ध यह क्या कह रहे हो। जब आगे अगले गांव में पहुंचे, तो शाम को एक तीसरा व्यक्ति आया। उसने कहा मुझे अभी तक ज्ञात नहीं हुआ है कि ईश्वर है या नहीं। आप बताएं कि मैं क्या करूं?
      बुद्ध बोले अभी तक जो ज्ञात है वह भूल जा। फिर पता लग जाएगा।
      अब तो आनन्द परेशान हो गए। उन्होंने बुद्ध से कहा एक ही दिन में तीन उत्तर अलग अलग आप ने दिये। बुद्ध मुस्कुराए ओर कहा, तुम दूसरों के उत्तर सुन  और परेशानी में पड़ गए हो। दूसरों के उत्तर सुन कुछ तय मत करो।
    मैंने तीन अलग अलग काम इसलिए किए कि जो जैसा था उसे वहां से हटा दिया। ये सब अपनी अपनी मान्यताओं में जड़ थे। और जड़ता धर्म तथा आध्यात्म को विकृत कर देती है। जो भी मान्यता है उसमें पहले जीवन उतारो और फिर देखो। तभी उसका उत्तर मिलेगा। जड़ता सारे जीवन को भर्मित कर देती है।
                        धन्यवाद
                            संग्रहकर्त्ता उमेद सिंह सिंगल।

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