loading...

2 ज्ञान की प्राप्ति।

Share:

      बुद्ध ने अपने अंतिम समय में अपने शिष्यों से कहा, किसी के मन में कोई शंका है? तो पूछ लो यह सही मौका है। बुद्ध ने अपनी बात तीन बार दोहराई, फिर भी किसी ने कुछ नहीं पूछा।
     अंत में बुद्ध ने कहा, "अप्प दीपो भव" अपना दीपक स्वयं बनो।
      किसी को मत खोजना। स्वयं को खोजना। किसी की शरण में मत जाना। बुद्ध ने अपने जीवन भर बहुत कुछ कहा, बहुत लोगों को रास्ता दिखाया। जीवन की एक नई धारा के बारे में बताया। लोगों की सोच को जागृत किया। जिसके बारे में लोग सोचते भी नहीं थे। सभी लोग एक यंत्र की भांति जी रहे थे। उन्हें चेताया, उन्हें जगाया। फिर भी अंत मे बुद्ध ने उन्हें कहा,--अप्प दीपो भव।
     बुद्ध ने तो जीवन के कई सारे राज खोल दिये थे। जीवन क्या है, जीवन क्यों है? और जीवन को कैसे जीना चाहिए। दुख कहाँ से आता है, दुख से मुक्ति का क्या मार्ग है? सब कुछ तो बुद्ध ने बता ही दिया था। फिर भी बुद्ध क्यों कहते हैं, अप्प दीपो भव।
      एक गांव के बाहर एक गुरु रहते थे।उनका नाम काफ़ी दूर दूर तक फैला था। उनका नाम सुनकर उनका शिष्य बनने के लिए एक युवक उनके पास आया। और गुरु की आज्ञा से उनका शिष्य बन भी गया। लेकिन कुछ ही दिन में वह अपने गुरु से ऊब गया। और सोचने लगा कि यह गुरु तो ऐसे ही नाम चला रहे हैं, इन्हें कुछ पता तो है ही नहीं। दो चार बातों को घुमा फिरा कर बता देते हैं। बार बार एक ही बात करते रहते हैं। कोई ज्ञान की बात तो करते ही नहीं। तब उस शिष्य ने निश्चय किया कि वह गुरु से कुछ कठिन प्रश्न पूछेगा। जिससे यह साबित हो जाएगा कि वह ज्ञानी है या नहीं। वह अपने गुरु के पास गया और उनसे बोला हे गुरुदेव मेरे कुछ प्रश्न हैं, कुछ जिज्ञासा हैं। क्या आप उनका समाधान करेंगे? गुरु ने कहा, ठीक है कहो क्या प्रश हैं,? शिष्य बोला यह मृत्यु क्या है? और यह क्यों आती है? गुरु ने कहा क्या तुमने जीवन को जान लिया? अगर हाँ तो ही मैं इस प्रश्न का उत्तर दे सकता हूँ शिष्य बोला गुरुदेव जीवन वह है जो ईश्वर ने हमें दिया है। उसकी भक्ति और आराधना करने के लिए। ताकि हमें उनके चरणों में स्थान मिल सके। गुरु ने कहा --क्या यह तुम्हें ईश्वर ने बताया है? शिष्य ने कहा नहीं। मगर सभी ज्ञानी लोग तो यही कहते हैं।
       गुरु ने कहा कोई और प्रश्न है? शिष्य ने कहा, मैं जानना चाहता हूँ कि मैं पिछले जन्म में कौन था? गुरु ने कहा--क्या तुमने अपने इस जन्म को जान लिया है। शिष्य चुप हो गया और सोचने लगा कि यह गुरु तो ढोंगी है। इन्हें तो कोई ज्ञान ही नहीं है। मैं व्यर्थ ही इनका शिष्य बन बैठा हूँ। गुरु ने कहा उधार के ज्ञान से कुछ होने वाला नहीं है। मैं तुम्हें रास्ता दिखा सकता हूँ। मगर उस रास्ते पर चलकर उस रास्ते को तुम्हें स्वयं जानना और पहचानना होगा। ज्ञान तुम्हारे भीतर ही है। तुम्हें उसे स्वयं ही खोजना होगा। मेरे बताने से तुम्हें कोई ज्ञान की प्राप्ति नहीं होने वाली।
         शिष्य ने सोचा गुरुदेव अपने आप को बचाना चाहते हैं। शायद उन्हें प्रश्नों का उत्तर नहीं पता। अगले दिन एक व्यक्ति गुरुदेव के पास आया। वह बोला मैं आपके शिष्यों को कुछ ज्ञान बाँटना चाहता हूँ। आगर आपकी आज्ञा हो तो। बुद्ध ने कहा क्या ज्ञान को बाँटा भी जा सकता है?
     हाँ क्यों नहीं? ज्ञान को जितना बाँटा जाता है यह उतना ही बढ़ता है।
     गुरु ने कहा मैंने तो जाना था कि ज्ञान बांटने से अज्ञान बढ़ता है। फिर भी ठीक है। तुम बांटना चाहते हो तो बाँट सकते हो।
    अगले दिन वह व्यक्ति सभी शिष्यों को अपना ज्ञान देता है। वह उन्हें जीवन के बारे मे धर्म के बारे में, ईश्वर के बारे में, अलग अलग उदाहरण देता है। वह व्यक्ति घण्टों तक लगातार बोलता रहता है। वह शिष्य जिसने गुरु से प्रश्न किये थे। उसने सोचा यह व्यक्ति तो बड़ा ज्ञानी है। मुझे तो इस व्यक्ति का शिष्य होना चाहिये था।
इसे तो धर्म शास्त्र के बारे में पूर्ण जानकारी है। यह तो सर्वज्ञाता है। इससे बड़ा ज्ञानी तो कोई और हो ही नहीं सकता। उस व्यक्ति ने अपना भाषण समाप्त किया और गुरु से पूछा क्या जो मैंने बोला वो सब सही है?
      गुरु ने कहा,-- तुमने बोला ही कहाँ? मैं तो इंतजार कर रहा था कि तुम बोलोगे? तुमने तो अभी बोलना शुरू भी नहीं किया। वह व्यक्ति हैरान हुआ और बोला। अभी तो मैंने इतना सारा कुछ बोला। क्या आपने सुना नहीं? आपके शिष्यों ने भी सुना, उनसे पूछें। गुरु ने कहा, अभी तक तो तुमने बोलना शुरू भी नहीं किया। अभी तो तुम्हारे धर्म ग्रंथ बोल रहे थे, तुम्हारे गुरु बोल रहे थे, तुम्हारे उदाहरण बोल रहे थे, तुम्हारी पुस्तकें बोल रही थी, तुम्हारा समाज बोल रहा था। तुम कहाँ बोल रहे थे? वह व्यक्ति बोला मैं समझा नहीं आप क्या कहना चाहते हैं। गुरु ने कहा अपनी आंखें बंद करो और ध्यान से सुनो। जो मैं कहता हूँ उसे विचारो और तब मुझे बताना। गुरु ने कहा, तुमने जीवन के बारे में कहा, क्या तुम जीवन को जानते हो? तुमने मृत्यु के बारे में कहा, क्या तुम मृत्यु के बारे में जानते हो?, तुमने पूर्वजन्मों के बारे में बताया, क्या यह तुम्हारा खुद का अनुभव है? तुमने ईश्वर के बारे में बातें की, क्या तुमने ईश्वर को देखा है ओर सुना है? कहीं ऐसा तो नहीं, यह सब बातें तुम्हें बाहर से पता चली और तुम इन्हें जानते बिल्कुल भी नहीं हो। अपने भीतर खोजो और इन्हें देखो? और परखो? इन में से कौन सी बात है जो तुम्हारा अनुभव है? उस व्यक्ति ने अपनी आंखें खोली और गुरु से कहा। गुरु जी आपने सही कहा। मैं तो कुछ भी नहीं जानता, मेरा अपना कोई अनुभव नहीं। मैं तो अभी दूसरों के ज्ञान को ही ढो रहा था। आपने मुझे बचा लिया गुरुदेव। आप मुझे अपना शिष्य स्वीकार करें गुरुदेव। आप मुझे बताएं कि मैं अपना ज्ञान कैसे अर्जित कर सकता हूँ।
        गुरु ने कहा कि उजाला नहीं होता तो स्वतः अंधेरा हो जाता है। अंधेरा न हो तो उजाले को होना ही पड़ता है। इसी प्रकार अज्ञान न हो तो जो बचता है वह ज्ञान ही होता है। तुम अपने भीतर अज्ञान को खोजो और उसे हटा दो। फिर तुम स्वयं ही ज्ञान की तरफ अग्रसर हो जाओगे। या फिर तुम अपने भीतर ज्ञान को खोजो तो अज्ञान स्वयं ही हट जाएगा। बुद्ध ने अपने पूरे जीवन लोगों से कहा कि आओ और जानो। उन्होंने कभी अपने विचार लोगों पर नहीं थोपे। उन्होंने नहीं कहा कि जो मैं कह रहा हूँ उसे मान लो। उनका मकसद रहता थ कि लोग अनुभव करें। अपने अनुभव के आधार पर ही लोग उनकी बातों को समझे। इसलिए बुद्ध ने अपने अंतिम समय में कहा,"अप्प दीपो भव" अपना दीपक स्वयं जलाओ।
     उनकी कही बातों पर भी मत जाना।समझ में आए और अनुभव हो, तो ही मानना। कहते हैं कि ज्ञान बांटने से बढ़ता है। लेकिन यह भी सही है कि ज्ञान को बाँटा नहीं जा सकता। क्योंकि जो स्वयं का अनुभव है वह तुम किसी से भी कहो। वह अपनी बुद्धि के हिसाब से ही समझेगा। वह वो सब अनुभव नहीं कर सकता जो तुमने किये। जिसके कारण उसके अन्दर एक अज्ञान उतपन्न होगा। और यह ज्ञानता वह दूसरों से साझा करेगा। ऐसे करते करते अज्ञान ही बंटेगा ओर ज्ञान खत्म हो जाएगा।
     अतः बुद्ध चाहते हैं कि आप स्वयं का ज्ञान उतपन्न करें। स्वयं को जानें। क्योंकि बहुत सारे अज्ञान को इकट्ठा करने से अच्छा है एक छोटा सा ज्ञान जो आपका स्वयं का अनुभव है। जो आपको जागृत करने में मदद कर सकता है।
                       धन्यवाद
                      संग्रहकर्त्ता उमेद सिंह सिंघल।
    

कोई टिप्पणी नहीं