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कबीर माया को मजूर बन्दों कहा। kabir ke shabd no 125

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माया को मजूर बन्दों, कहां जानै बन्दगी।।
माया को ही ध्यान धरै, खोटे-२ कर्म करै।
       गन्दगी को कीड़ो प्राणी, मानत आनन्दगी।।
पाप केरी पोट कीन्हो, तिलक निंदा को कीन्हो।
       कथा तो कपट की बांचै, डारै सब फ़न्दगी।।
साधुओं से धूमधाम, चोरों के करते काम।
      मूर्खों से चापलूसी, गरीबों से खुन्दगी।।
बन्दगी न नेक भावै, चन्दगी को चित्त चाहवै।
      कबीर कह रे मूर्ख, खोई खाली जिंदगी।।

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