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कबीर सुहागिन मैं तो हो। kabir ke shabd no 205

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सुहागिन मैं तो होए गई हे मेरा, जिस दिन मरा भरतार।
       विधवा रही पति जीने से, भोगे कष्ट अपार।
       जिस दिन मत गया पति हमारा, खूब करे सिंगार।।
पाँच पुत्रों ने मार के मैं, भई सपूती नार।
जिस दिन मर गए दसों भाई, सोई थीं पैर पसार।।
     मात पिता के ही मरने से, मिटी सभी तकरार।
     सारे सुख उस दिन भोगूँगी, लूँ सारे कुटुम्ब ने मार।।
कह कबीर सुनो भई साधो, इसका करो विचार।
इस त्रिया ने के सुख भोग्या, सारे कुटुम्ब ने मार।।

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