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कबीर प्रेम प्रीत की रीत। 208

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प्रेम प्रीत की रीत दुहेली, जो जाने सो जाने जी।।
    सिर देवै सो प्याला लेवै, मूर्ख क्या पहचाने री।।
कायर का ये काम नहीं है, न्यू महबूब ने माने री।
    तन मन धन सब कुछ सौंपे, साहिब हाथ बीकाने री।
नित्यानन्द मिले स्वामी गुमानी, लग गई चोट निशाने री।

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