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40 कबीर मेरे सद्गुरु पकड़ी 24

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मेरे सद्गुरु पकड़ी बांह, नहीं तो मैं बह जाती।।

कर्म जाल में उलझ के, आन पड़ी भँव जाल
       विषय वासना के वश होकर, व्याकुल भई अपार।
                हृदय में अकुलाती।।

मात पिता परिवार सुत, लोक कुटुम्ब धन धाम।
       अंत समय परलोक में, कोई न आवै काम।
                  बन्धु बेटा नाती।।

भजै नहीं सत्तनाम को, जो मानुष तन पाए।
       पाप कर्म में पड़ा हुआ, वो नर्क कुंड में जाए।
                  देख पाटै छाती।।

जब सद्गुरु उपदेश की, भनक पड़ी मेरे कान।
       उदय भयो विज्ञान उर, नाश भयो अभिमान।
                 सुमति राती माती।।

कर जोड़े धरमन कहे, करुणा सिंधु कबीर।
       तुम होते नहीं जगत में, को हरता मेरी पीर।
                 तभी तो तेरे गुण गाती।।

                  

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