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कबीर नमो निरंजन -३। 27

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नमो निरंजन-३ स्वामी।
सदा विराजो मेरे उर में, अवगत अन्तर्यामी।।
      निरंकार निर्लेप निरंतर, निर्गुण सर्गुण नामी।
      चिदानन्द चैतन्य चहुदिश, परम् गुरु प्रणामी।।
सर्वांगी सम्पूर्ण सब घट, सन्तरूप सुख धामी।
जगन्नाथ जगपती जगजीवन, तूँ ही कृष्ण तूँ ही रामी।।
     व्यापक विष्णु विश्व बहुरंगी, व्याप रहे सब ठामी।
     अगम अपार अधर अविनासी, अटल पुरुष वर्यामी।।
मन मोहन मन हरण मनोहर, गुप्त गरुड़ के गामी।
गुणातीत गोविंद गोसाईं, निर्मल नित नेह कामी।।
  तेज पुंज पारस परमेश्वर, तूँ महबूब गुमानी।
  नित्यानन्द झड़ लगी मेहर की, हो रही आहमी साहमी।
    

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