loading...

कबीर वा घर जाइए हे निंद्रा। kabir ke shabd no 297

Share:

वा वह जाइए हे निंद्रा, जिस घर राम नाम ना भावै।।
    बैठ सभा में मिथ्या बोलै, निंदा करे पराई।
    सो घर हमने तुम्हे बताया, जाइयो बिना बुलाई।।
के तूँ जाइए राजद्वारे, के रसिया रस भोगी।
म्हारा पीछा छोड़ बावली, हम तो रमते जोगी।।
   ऊंचे-२ महलों जाइयो, कामनी प्यार कराइयो।
   म्हारे धोरै के लेगी बावली, पत्थर पे सिर फ़ूडवाईयो।।
कह भरथरी सुन री निंद्रा, यहां नहीं तेरा वासा।
हम तो रहते राम भरोसे, गुरु मिलन की आशा।।

No comments