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कबीर चरखले आली री 304

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चरखले आली री तेरा चरखा बोलै राम राम ,
                                 तूँ भज ले नै तुंही।।
    चरखा तेरा रंग रँगीला, पीढ़ा लाल गुलाल।
    कातन आली शाम सुंदरी, मुड़ तुड़ घालै तार।।
शरीर है तेरा रंग रंगीला, अन्तःकरण है लाल।
कातन आली जीभ सुंदरी, चलै ओली सोली चाल।।
     सास कुंवारी बहु पेट में, ननद पंजीरी खाए।
    देखन आली कै छोहरा होग्या, बांझ खिलावन जाए।।       तृष्णा सासु आश पेट में, या निंदा ननद कहाए।
समता दृष्टि ज्ञान का छोहरा, बुद्धि बांझ कहाए।।
      ऊंचे टीले हल चलै रे, बैल गऊ के पेट।
      हाली झूलै पालना, छकियारी पहुँची खेत।।
दसवाँ द्वारा ऊँचा टीला, इन्द्रिय में अहंकार।
सुषम्ना नाड़ी योगी झूलै,कुण्डलनी हुई त्यार।।
      बेटी बोली बाप से तूँ,अंजाया वर ला।
      अंजाया वर ना मिले तो, मेरा तेरा ब्याह।।
सुरति कहन लगी मन से, मेरा अंजाया वर ला।
अंजाया वर सबका ईश्वर, सुरति मन के माह।।     
    लखमीचन्द ने गुरु मानसिंह, सन्त मिला अलबेला।
    जो मेरे भजन का अर्थ खोल दे, पूरे गुरू का चेला।।
नगर भिवानी से पूर्व में, उमरावत है गाम।
संशय हो तो आन फेटियो, रामचन्द्र मेरा नाम।।

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