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कबीर दीवाने बन्दे क्या। 326

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दीवाने बन्दे, क्या गावै घर दूर।
अनल हक्क सरे को पहुंचे, सूली चढ़े मंसूर।।
     शेख फरीद कुँए में लटके, हो गए चकनाचूर।
      सुल्तानी तज गए बलख को, तज 16 सहस्र हूर।।
गोपीचंद भरथरी राजा जी, सिर में डारी धूर।
जन रविदासा कबीर कमाला, सन्मुख मिले हुज़ूर।।
     दोनों दीन मुक्ति को चाहवै, खावैं गऊ और सूर।
     दास गरीब उदार नहीं है, सौदा पुरमपूर।।

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