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कबीर संतों घर में झगड़ा भारी। 338

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सन्तों घर में झगड़ा भारी।।
रात दिवस मिल उठ उठ लागैं, पाँच चोर एक नारी।।
    न्यारो न्यारो भोजन चाहवै, पांचों अधिक स्वादी।
    कोय काहू की बात न मानै, आपै आप मुरादी।।
दुर्मत के दिन गिण भेटें, चोर ही चाप चबेरे।
कह कबीर सोई जन मेरा, जो घर की रार निबेरे।।

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