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कबीर अवगत से चल आया kabir ke shabd no 320

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   अवगत से चल आया रे, तेरा भेद भर्म ना पाया।
ना मेरा जन्म न गर्भ बसेरा, न बालक गोद खिलाया।
कांसी शहर जल विच डेरा, तहाँ जुलाहा पाया।।
   मातपिता मेरै कुछ नाहीं, नहीं गृह और दासी।
   जुलहा का सुत आन कहाया, लोग करें मेरी हांसी।।
धरण गगन मेरै कुछ नाहीं, सूझै अगम अपारा।
सत्त सरूपी नाम साहब का, जो है नाम हमारा।।
    अधर दीप और भँवर गुफा में, तां निज वस्तु हमारा।
    जोत सरूपी अलख निरंजन, जपते नाम हमारा।।
हाड़ मांस लहू न मेरै, हम हैं सत्य उपासी।
तारन तरन अभय पद दाता, कह कबीर अविनाशी।।

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