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कबीर दुविधा को कर दूर। kabir ke shabd no 374

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दुविधा को कर दूर धनी को सेव रे।
तेरी भँव सागर में नाव, सूरत से खेव रे।।
    सुमर, सुमर सत्तनाम चिरन्जी जीव रे।
    खांड नाम बिन मूल घोल क्यूँ ना पीव रे।।
काया में नहीं नाम धनी के हेत का।
बिना नाम किस काम, मटीला डला रेत का।।
        ऊंची कचहरी बैठे, जो न्याय चुकावते।
        गए माटी में मिल, नजर नहीं आवते।।
तूँ माया धन धाम देख मत फूल रे।
चार दिनों का रंग मिलेगा धूल रे।।
      बार बार ये देह नहीं है बीर रे।
      चेता जा तो चेत, न्यू कहत कबीर रे।।

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