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कबीर जिस में बोलै सै रमता। 90

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जिसमे बोलै सै रमता रे राम, जुगलिया रे चम की।
         चाम ही की गाय है रे, चाम का ज्वारा।
         चाम नीचे चाम चुंघे, चाम चूंगावँन हारा।।

चाम ही की धृतरी रे, चाम का आकाशा।
चाम ही के नोलख तारे, चाम का प्रकाशा।।

         चाम ही की लाव है रे, चाम का लवारा।
         चाम ही ने चाम खींचे, चाम खिंचावन हारा।।

कह कबीर सुनो भई साधो, कौन चाम से न्यारा।
जो कोए होए चाम से न्यारा, वोहे गुरु हमारा।।

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