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कबीर म्हारे सद्गुरु दे रहे हेला रे। 349

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म्हारे सद्गुरु दे रहे हेला रे,सत्त नाम सुमर मन मैला रे।
    कोढ़ी-२ माया जोड़ी, जोड़ भरा एक थैला रे।
    खाली आया खाली जागा, संग चले ना एक धेला रे।।
मातपिता और कुटुंब कबीला, दो दिन दर्शन मेला रे।
यहीं मिला और यहीं बिछुड़जा, जागा हंस अकेला रे।।
    एक डाल दो पँछी बैठे, एक गुरू एक चेला रे।
    चेला तो भाई चुन-२ लावै, गुरू निरन्तर खेला रे।।
कौन कर्म तैं गुरू जी उतरे, कौन कर्म तैं चेला रे।
भक्ति करे तैं  गुरु जी उतरे, सेवा करे तैं चेला रे।।
   अपनी करनी गुरु उतरगे, अपनी करनी चेला रे।
   यहीं मिले और यहीं बिछुड़गे, गुरु चरण चित्त चेला रे।
सत्त के कारण गुरू उतरगे, सेवा कारण चेला रे।
कह कबीर सुनो भई साधो,दुनिया दो दिन मेला रे।।

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