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190 कबीर तूँ चाली जा हे मार्ग अपने को। kabir ke shabd no 132

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           तूँ चाली जा हे, मार्ग अपने को।।
तूँ ठगनी ठगने को आई, ठगने आई मोय।
हम हैं ठगिया रामनाम के, बेच खाएँगे तोय।।
        घूंघट काढ़ चली पीहर को, घूमर-२ होय।
        इन गलियों में के काम तेरा, लम्बी डगरिया होय।।
अब पछताए क्या होत सुंदरी, दीन्हा खलक बिगोय।
सूरत देख पिया की रोइ, लाज न आई तोय।।
       प्रेम पियाला सोई जन पीवै, जीवत मर जा जोय।
       कह कबीर सुनो भई साधो, असल जात का होय।।

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