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कबीर देही ने के धोवै। 256

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   देही ने के धोवै मलमल के, ले जागा काल मसल के।
खाए मलीदे फूले दीदे, मोटा हो गया पल के।
मानष जूनी हरि बिन सूनी, खोई बराबर खल के।।
   आई जवानी मद प्रकाशा, त्रिया ला लई गल के।
   जिसने मरना सम्मुख दिखे, चालो सोच सम्भल के।।
काम करे जब प्यारा लागै, कुनबा खा रल मिल के।
बूढा हो जब परै हटा दें, सब चालें टल टल के।।
   गई जवानी आया बुढापा, नैनां पानी ढलके।
   बिजली कैसा पलका लागै, ले जागा छल बल कै।।
जो भँवसागर पर उतरगे, हरि का नाम सुमर कै।
शोभानाथ की कृपा हो गई, मेहरनाथ बे धड़के।।

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