कबीर यो सँसार पाप का बंधन। 146

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यो सँसार पाप का बंधन, तोड़ लिए जै तोड़ सकै तै।
उस ईश्वर से नाता बंदे, जोड़ लिए जै जोड़ सकै तै।।
पाप मूल अभिमान बतावै, दया धर्म का मूल मिलै।
अक्षर-२लिख राखे, ना उसके घर में भूल मिले।
लख चौरासी में लिख राखे,सूक्ष्म और स्थूल मिले।
तूँ किसका मां गुमान करै सै, अंत धूल में धूल मिले।।
              आशा तृष्णा तैं बन्दे मूँह,
                         मोड़ लिए जै मोड़ सकै तै।।
दसों इंद्रीय तेरे शरीर की, चित्त बुद्धि ने भंग करैं।।
नित नए खेल खिलावन खातिर, मन मूर्ख तनै तंग करै।
काम क्रोध मन लोभ मोह में, धर्म की गैल्यांजंग करै।
विषय रूप अंधकार के फंदे, तेरे फांसन का ढंग करै।
             ये अन्धकूप में जा पटकें,
                         दौड़ लिए जै दौड़ सकै तै।।
चेती जा तै चेत बावले,फेर के बाकी रह जागा।
धन का होजा रेत बावले, फेर के बाकी रह जागा।
कर उस ईश्वर से हेत बावले, फेर के बाकी रह जागा।
जब चिड़िया चुगजां खेत बावले, फेर के बाकी रह जागा
              दसवाँ द्वार ब्रह्म का रास्ता,
                         फोड़ लिए जै फोड़ सकै तै।।
एक ने मार पाँच मर जावै, बात बढ़न की ना सै रै।
अक्षर पढले एक ॐ का, घणे पढ़न की ना सै रै।
जै सत्संग शेल लागजा तन में,और गड़न की ना सै रै।
काट की हांडी चढ़े एक बै, फेर चढ़न की ना सै रै।।
               कृष्ण लाल ज्ञान का चमचा,
                         रोड़ लिए जै रोड़ सकै तै।।

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