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कबीर रोएगा लोभी, थक जांगे पौरुष तेरे। kabir ke shabd no 267

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रोवैगा लोभी थक जांगे पौरुष तेरे।।
आज जिसको कहता मेरे मेरे, होंगे वे दुश्मन तेरे।
तेरे खोदे तुझे मिलेंगे, तेरे हाथ के झेरे
  उस कुनबे ने के सिर पे धरेगा, जिसको कहता मेरे।
  कुनबे खातिर पिटता डोलै, बोले झूठ घनेरे।।
बूढा होके शक्ल बिगड़जा, काल लगावै फेरे।
गुरू का शब्द सत्य नहीं माना, समझै ऊत लुटेरे।।
    महल हवेली सभी छूटजा, हों मरघट में डेरे।
    कह कबीर सुनो भई साधो, जगह चौरासी में गेरे।।

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