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कबीर ये तरने का घाट। 173

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        ये तरने का घाट,भूले मनवा समझिये रे भाई।।
कथनी के सूरे घणे, वे थोथे बांधै हथियार।
रण में तो कोय डटै सुरमा, जित बाजै तलवार।।
        सूरा रण में जाय के रे, किसकी देखै बाट।
        ज्यूं-२ पग आगै धरै रे, आप कटै चाहे दे काट।।
सति चिता पे चढ़ गई, वा कर प्रीतम से प्यार।
तन मन अपना सर्वस सौंपा, मिली राख में राख।।
      हीरा बीच बाजार में, सब परखें साहूकार।
      जब तक मिले न पारखी, सबकी अटल सम्भाल।।
तन मन सौंपा गुरू अपने को, सत्त शब्द पे चाल।
मुश्किल से आसान हुआ रे, जब तैं सूखे थी जान।।
     कह कबीर सुनो भई साधो, कुछ तो करो विचार।
     चेता जा तो चेत बावले, ना खा जागा वैरी काल।।

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