loading...

कबीर गुरू जी ऐसा ज्ञान सीखा दे। 205

Share:

गुरू जी ऐसा ज्ञान सीखा दे, कोय गावनिया ए गा दे।।

बेहमाता की मात बता दें, सास बतादे गोरां की।             शिव शंकर का पिता बता, फेर बात करेंगे ओरां को
अष्टभुजी किसकी पुत्री थी,जिने करी सहायता चोरां की
इसा महात्मा कौन हुआ, जिने करी सवारी मोरां की।
                        मेरे मन का भर्म मिटा दे।।
बेमाता की मात गायत्री, अनुसुइया सास थी गोरां की
शिव शंकर का पिता अंगिरा, इब बात सुनो तुम ओरां की।
अष्टभुजी ब्रह्मा की पुत्री, जिने करी सहायता चोरां की।
हुआ बालकनाथ इसा साधु, जिनै करी सवारी मोरां की।
             हो ज्ञान बिना भर्म नहीं मिट पाया।
                             मनै खोल सभा में गाया।।
उस लड़के का नाम बतादे, जो बिन माता के पेट पड़ा।
बिना पिता के पैदा होग्या, बेमाता ने नहीं घड़ा।
लेते जन्म करी लड़ाई, ना कोय सम्मुख हुआ खड़ा।
किसकी सेना हड़ा दई, फेर देवलोक में ज़िक्र छिड़ा।।
                 हो गुरु जी अम्बर में पहाड़ रचा दे।।
उस लड़के का नाम गणेश, जो बिन माता के पेट पड़ा।
गोरां मां ने करी घड़ाई, बेमाता ने नहीं घड़ा।
लेते जी जन्म करी लड़ाई, ना कोय सम्मुख हुआ खड़ा।
शिव सेना भी हरा दई, फेर देवलोक में जिक्र छिड़ा।
               सूरत ने सब ब्रह्मांड दिखाया।।
बाप के ब्याह में बना बीचोला, वो लड़का किसने जाया।
कर असुरों सी वृत्ति देवता, कौन से युग जीमन आया।
किसकी होगी हार बता वो, छका नहीं भूखा ठाया।
जल के कारण प्रलय होगी, जब चोगिरदे जल बरसाया।
              हो गुरू जी, बेल धर्म की लादे।।
बाप के ब्याह में भीष्म बिचोला, गंगा माँ ने जाया था।
कर असुरों सी वृत्ति गणेश, सतयुग में जीमन आया था।
कुबेर की होगी हार उड़ै, वो छिका ना भूखा ठाया था।
जल के करण प्रलय होगी ना पीवन ने जल पाया था।
              हो प्रलय में बड़ का पेड़ बचाया।।
अपनी खुशी से प्राण त्याग दिये,
                                फेर लड़की का चोला पाया।
हुई जवान पड़ी जरूरत,
                            पति मोल खरीदा ब्याह करवाया।
किस तरियां तैं उस लड़की ने, एक पल में पुत्र जाया।
पति की सेवा करन लागगी, फेर पुत्र का सिर तरवाया।
              हो गुरू लखमीचन्द ने समझा दे।
दक्ष के घर से प्राण सती ने,हिमाचल घर जन्म धारा।
हुई जवान पड़ी जरूरत, मन ही मन शिव नाम पुकारा।
पल में गिरिजा ने गणेश बनाया, भेद बता दूं न्यारा-२।
न्हा धो के शिव सेवा में बैठी,
           शिव ने सुत का शीश उतारा।।
                      हो गुरू जगदीश ने समझाया।।

कोई टिप्पणी नहीं