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कबीर हे मेरी सूरत सुहागण नार नींद में। kabir ke shabd no 213

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हे मेरी सूरत सुहागण नार, नींद में सोवै मतना।।
   करले चेत हेत ला हर में, सर्वव्यापक है नारी नर में।
       हे लिए अपना आप निहार, वक़्त ने खोवै मतना।।
घट प्रगट है नाम निरंजन, दीनानाथ है सब दुःख भंजन।
   लेकर रामनाम सरकार, तूँ हरि का धन खोवै मतना।।
लेले अपने गुरू का शरणां, ऐब दुःखों का होगा हरणा।
   हे लिए भर्म कर दूर, बोझ सिर ढोवै मतना।।
सत्संग गंग में मलमल न्हा ले, राम नाम का साबुन लाले।
      लिए अपनी हद ने बुहार, तूँ कांटे बोवै मतना।।
अपनी सच्ची लगन लगाले, मन मन्दिर में दर्शन पाले।
   मेरी सुन ले दीनदयाल, तूँ कायर होवै मतना।।

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