कबीर ये तन बालू कैसा डेरा। 281

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          ये तन बालू कैसा डेरा हो जी।
जैसे दामिनी दमक चमक को, छन नहीं रहत उजेरा जी।
    गाड़ी घोड़ा और चाकर, इनमें ना कोय तेरा ही जी।
    जिनके कारण भरमत डोलै, करता मेरा मेरा रे।।
मैड़ी मंडप मुल्क खजाना, और परिवार घनेरा हो जी।
ये सबको सुख सा दिखत है, राम सम्भाल सवेरा हो जी।
  थोड़े से जीवन के कारण, करता बहुत बखेड़ा हो जी।
  कालबली तोहे सूझत नाही, करै अचानक घेरा हो जी।
कह सुखदेव समझ नर भोंदू, हाड़ विषय उलझेड़ा जी।
चरणदास हरिनाम भजन बिन, कैसे होय निबेड़ा जी

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