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कबीर गुरु गम ज्ञान एक न्यारा। 330

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गुरु गम ज्ञान एक न्यारा रे साधो भाई।।
समझैगा गुरुमुख प्यारा रे साधो भाई।।
मूँड़ मुंडावै कोय जटा बढ़ावै, जोड़ जटा सिर भारा जी
पशु की तरियां कोय नँगा डोलै,अंग लगावै चारा जी।।
कन्दमूल फल पात खात कोई, वायु करें आहारा जी।
गर्मी सर्दी भूख प्यास सहे, तन जीर्ण कर डारा जी।।
सर्प छोड़ बांबी को पुजै, अचरज खेल अपारा जी।
धोबन पे वश चले नहीं रे, गधे ने क्या बिगाड़ा जी।।
ब्रह्मा विष्णु शंकर तक गए,धर धर जग ओतारा जी।
पोथी पन्ने में क्या ढूंढे, वेद कहत नित हारा जी।।
वेद कर्म और किरिया से, ये वो लावै वारा जी
कह कबीर सुनो भई साधो, मानो वचन हमारा जी

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