कबीर मेरे सद्गुरु चेतन चोर। 58

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   मेरे सद्गुरु चेतन चोर, मेरा मन मोह लिया जी।।
जिसके लागै वोहे जानै, के जानै कोय और।
घायल की गत घायल जानै, के जानै पगचोर।।
   भूल गई मैं तन मन अपना,भूली लाख करोड़।
   लगी हुई एक पल ना बिसरू,जैसे चाँद चकोर।।
जब से दृष्टि पलटी मेरी, नजर न आवै कोय और।
ढूंढ़ लिया मनै घट के अंदर, मिट गई मन की लौर।।
   चली चली सद्गुरु पे पहुंची, भाज गए सब दूर।
   मीरा को रविदास मिले हैं, चला नहीं कोय जोर।।

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