कबीर ये जग तासों का खेल। 274

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ये जग ताशों का खेल, सम्भल के खेलिये भाई।।
इक्का तेरा एक नाम है दुग्गी ने दे छोड़।
तिग्गी तेरे तीन ताप है, चुग्गी चले मुख मोड़।।
    पंजी तेरे पाँच तत्व हैं ये भी जांगे छूट।
     धर्मराज कै तूँ बांधा जागा, छक्के जांगे छूट।।
सत्ती तेरे संग चलेगी, यो कुनबा जागा छूट।
अट्ठी तो तेरे आठ कंवल रे, ये भी जांगे टूट।।
     नहला तो तेरी नो गृह रे, दीन्ही गृह लगाए।
      दहला तेरे दसों द्वारे, तूँ गुल्ला लिए बचाई।।
बेगम तो तेरी रोय मरेगी, बैठी-२ बाहर।
बादशाह भी मारा जागा, कोय न बचावनहार।।
    बावन पत्ते ताश के रे, वहां तक जानो काल।
    कह कबीर गुरू बिन साधो, करता न कोय सम्भाल।।

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