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कबीर बिन सद्गुरु पावै नहीं। 347

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बिन सद्गुरु पावै नहीं, जन्म धराओ सो सो बार।।
चाहे तो लोटो धरण में हेली री, सुन्न में बंगला छाय।
लटा बढ़ाओ चाहे शीश पे, नाद बजाओ दो चार।।
  कड़वी बेल की कचरी हे हेली, कड़वा ऐ फल होय।।
  जिंद भई जब जानिये, बेल बिछौवा होए।।
जिन्द भई तो क्या भई हे हेली, चहुँ दिशा फूटी बात।
बचा बीज बाकी रहा हे, फेर जामन की आश।।
  दो लागी घणी बेलड़ी हे, जल बुझ हो गया नाश।
  आवागमन जब से मिटा हे, कह गए धर्मिदास।।

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