कबीर माटी के माह माटी। 251

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माटी के मह माटी मिलगी, -२ पवन पवन के म्हां
किसकी करें रुखाली माली, कोन्या फूल चमन के मांह।

एक दीपक में तैं लिकड़ रोशनी, धुआँधार तेल जलग्या।
इन पाँचा में तैं एक लिकड़के, बेरा ना कितसी रल गया।
अंधेरे में हुआ अंधेरा, चाँदन में चाँदन खिलग्या।
वायु में वायु मिलगी ओर, पानी मे पानी मिलग्या।
             जैसे जीव से ब्रह्म ब्रह्म से माया,
                          न्यारी रह चवन के माह।।
जहां रविशशि न पक्षपात, रज रक्त रजा मद में मिलग्या।
एक अंशमात्र सा सरूपबना पर,छोटेसे कद में मिलग्या।
जहां जीवता नाद ब्रह्म की शक्ति,
                  उस घर की हद के माह मिलग्या।
सूक्ष्म सा स्थूल छोड़ के, परम् पति पद में मिलग्या।
                 ना गलै नीर में ना कटै शस्त्र से,
                                   जलता नहीं अग्नि के मांह।।
कहे सुने की ना मानै जब, आपै व्याधा मिट जागी।
जब सड़ उठेगी ल्हास कुंवर की, आपै उल्टी हट जागी।।
घरबार छोड़ के चाल पड़ी, तेरी न्यू के जिंदगी कट जागी
जगत सरहाना करै तेरी, तूँ दुनिया के मांह छंट जागी।
                 एक तुलसी की माला ले,
                                कर भक्ति भजन भवन के मांह।।
बाग़ का माली न्यू कह रहा सै, सुनती हो तै बोल बहु।
जिने टोह्वै वा ना पावै, चाहे कितनी ऐ ल्हास टटोल बहु।
बनी -२के सब साथी और, ना बिगड़ी का मौल बहु।।
चित्त करके माटी सँगवाले, मत हो डांवाडोल बहु।
                  कह लखमीचन्द दासी बन भगवन की,
                               फेर कहगा जगत नवन के मांह।।

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