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कबीर। भजन बिना व्यर्था ही ऊंट बढ़े। kabir ke shabd no 129

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भजन बिना वृथा ही ऊंट बढ़े।।
तीन हाथ की नाड़ बना दई, ठोड़ी में दांत गड़े।।
नाथ नकेल हाथ मे ले के, दो दो जवान चढ़े।।
    छोड़ दिये जब चले पछाए, ढूंढे नाय ढूंढे।
     इंद्र राजा मेहर करे तो, चौड़े रपट पड़े।।
आम खाए महुआ भख डारे, पीपल डूण मरे।
पांच सात मन बोझा लादो, बैठत उठत मरे।।
    रोम रों में कीड़ा पड़ गए, काढ़े नाय कढ़े।
    कह कबीर सुनो भी साधो,जम के फन्द पड़े।।

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