कबीर। तुम ऐसा रंग लगाओ। 233

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तुम ऐसा रंग लगाओ म्हारे सद्गुरु, मैला कभी न होई।।
सत्त कुशुम्भा शब्द बीज है, आशा फिकज सोई।
गुरू चरणों की करे बन्दगी, निज साधुजन सोई।।
निर्मल नीर प्रेम से धोया,सुरति सज्जी सोई।
     निश्चय रंग नाम का गाढ़ा, दुविधा दुर्मत खोई।।
भाव भक्ति का रंग निराला,धरया गरीबी माहीं।
    दया खटाई लगी समझ की,सो रहनी सिल आई।।
मन वस्त्र इक चोला रँगते, ओढ़ें सन्त सिपाही।
    भगत जगत को चले जीत के, अलख नाम लौ लाई।
साधु रंग जगत में खिल रहा,साध सती निर्मोही।
    घिसा सन्त जुलाहा भाखै,आदी वस्तु जोई।।

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