कबीर। घट ही में अविनाशी। 331

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घट ही में अविनाशी। साधो घट।।
     काहे रे नर मुथरा जावै, काहे जावै कांसी।
     तेरे तन में बसै निरंजन, जो बैकुण्ठ निवासी।।
नहीं पाताल नहीं स्वर्ग लोक, नहीं सागर जल राशि।
जो जन सुमरण करत निरंतर, सदा रहे तिन पासी।।
    जो तूँ उसको देखा चाहवै, तब तूँ होय उदासी।
    बैठ एकांत ध्यान नित कीजे, होय जोत प्रकाशी।।
हृदय में जब दर्शन होवै, सकल मोह टीम जासी।
ब्रह्मानन्द मोक्ष पद पावै,कटै जन्म की फांसी।।

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