कबीर। तुम देखो बाबा सन्त करें। 332

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तुम देखो बाबा, सन्त करें बादशाही।।
दया शहर और शब्द मुल्क है, समझ की गलियां भाई।
        निश्चय नाम तख्त पे बैठे, रजा दाम ले याहीं।
सत्त की तोप ज्ञान का गोला, प्रीत की चकमक लाई।
      प्रेम सिपाही लड़ने लागा, भर्म की बुरजां ढाई।।
पांच पचीसों पकड़ मंगाए, भेज्या शील सिपाही।
    क्षमा कैद में डार दिये हैं, मुर्दे जिन्दे याहीं।।
काया नगर का राज करत हैं, मुल्क बहुत सा याहीं।
    तीन लोक का नाथ विराजे, सोधि विरलां ने पाई।।
निर्भय राज दिया सद्गुरु ने, हरि हरि होत हवाई।
   घिसा सन्त पे कृपा हो रही, पाई अटल बादशाही।।

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