कबीर हेली हमने नींद ना आवै हे 344

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हेली हमने नींद ना आवै हे, सोवै है नगरिया सारी जी।
        चेतन चिराग जल रहा, चाँदना हवेली में।
        बगड़ में अंधेरी छाई, डरूँ थी घनेली मैं।।
नोऊं खिड़की बन्द करके, सोचती अकेली मैं।
पिया पिया टेरन लागी, नार थी नवेली मैं।।
       इतने में एक शब्द हुआ था, ओहंग सोहंग हेली में।
       शाम सुंदर मन्दिर अंदर, दिखो खड़ो हवेली में।।
सुनन शिखर में सेज पिया की, बाँह पकड़ के ले ली मैं।
टीकमदास बहुत सुख पाई, पिया संग चौसर खेली मैं।।

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