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कबीर चली जा रही है, उम्र धीरे धीरे। kabir ke shabd no 261

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चली जा रही है, उम्र धीरे धीरे।
      ये पल पल आठों, पहर धीरे धीरे।।
बचपन भी बीता, जवानी भी जाए।
                बुढ़ापे का होगा, असर धीरे धीरे।।
तेरे हाथ पांव में, बल ना रहेगा।
                 झुकेगी तुम्हारी कमर धीरे धीरे।।
शिथिल अंग होंगे सब, इक दिन तुम्हारे।
                  तेरी मन्द होगी, नजर धीरे धीरे।।
बुराई से मन को तूँ अपने हटा लें,
                 मंजिल तक जाएगा, सफर धीरे धीरे।।

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