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कबीर वा दिन की कुछ। kabir ke shabd no 160

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वा दिन की कुछ सुधि कर मनवा।
जा दिन ले चल ले चल होइ। ता दिन संग चले ना कोई।
मातपिता बन्धु सुत रोय, माटी के संग दियो समोय।।
               सो माटी काटेगी तनवाँ।।
उल्फत नेहा उल्फत नारी, किसकी दीदी किसकी बांदी।
किसका सोना किसकी चान्दी, जा दिन है यम ले बांधी।
                  तेरा जाए, पर वह बनमां।।
टांडा तुमने लादा भारी, बनज किया पूरा व्यापारी।
जुआ खेला पूंजी हारी, अब चलने की भई है तैयारी।
                 हित चित अब कुछ लाओ मनवा।।
जो कोई गुरू से नेह लगाए, बहुत भांति सोई सुख पावै।
माटी की काया माटी मिल जाए,कबीर आगे गहराए।
                   साँचा साहिब के लगजा सँगमां।।

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